रिवाइज कोर्स मुरली 22-01-1969          

                                                

निराकार ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप परमपिता शिवपरमात्मा इस धरती पर अवतरित होकर ज्ञान और योग से धर्म की स्थापन कर रहे हैं।

परम शिक्षक शिवपरमात्मा के द्वारा बताई गई इस ज्ञान मुरली को आत्मिक स्थिति में पढ़ना चाहिए।

आत्मिक स्थिति में आने के लिए किये जाने वाले संकल्प :

1. मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ, शिवबाबा मेरे परमपिता हैं।

2. मैं ईश्वरीय विद्यार्थि हूँ, बाबा मेरे टीचर हैं।

3. बाबा मेरे सद्गुरु हैं, मैं मास्टर सद्गुरु हूँ।

4. शिव परमात्मा मेरे जीवन साथी हैं, मैं शिव परमात्मा की जीवनसाथी हूँ।

5. सर्व संबंधों को बाबा से जोड़कर उस संबंध के कर्त्तव्य को ब्राह्मण जीवन में आचरण में लाने से आत्मिक स्थिति सहज हो जाती है।

आत्मिक स्थिति में, हर एक मुरली में, "बाबा मुरली मुझ से ही कह रहे हैं", ऐसे भाव से पढ़ना चाहिए।

"दोपहर भोग के समय वतन का समाचार"

आज वतन में गई तो ब्रह्मा बाबा जैसे यहाँ मुलाकात करते थे वैसे वहाँ ब्रह्मा बाबा ने मुलाकात की । बाबा ने कहा बच्चों के भोजन के समय के अनुसार लेट आई हो । मैंने कहा - बाबा आपका तो एक डेढ बजे भोजन पान करने का समय था । बाबा ने कहा बाबा जब बच्चों के साथ भोजन खाता था तो बच्चों के टाइम भोजन खाता था । उस टाइम से लेट आई हो । फिर बाबा ने ब्रह्मा बाबा को कहा कि ले जाओ ....क्या जाकर देखा कि जैसे यहाँ आफिस में कुर्सी पर बाबा आकर बैठता था, पत्र लिखता था तो वही कुर्सी, वही पैड, वही पेंसिल रखी थी । मैं तो हैरान हुई कि यह सभी चीज़ें वतन में कैसे आ गई । फिर बाबा ने हस्त लिखित पत्र मेरे को दिया । मैंने पढ़ा - जिसमें लिखा हुआ था

"स्वदर्शन चक्रधारी नूरे रत्नों याद-प्यार के बाद, आज अव्यक्त रूप से आप अव्यक्त स्थिति में स्थित हुए बच्चों से मिल रहे हैं ।" दूसरे पेज में लिखा था - "बच्चे, जो बापदादा के साकार रूप से शिक्षायें मिली हैं उसका विस्तार करते रहना । अब न बिसरों न याद रहो ।" विदाई के बाद बाबा जैसे सही डालते हैं वैसे डाली हुई थी । बाबा ने कहा हमने अपने समय पर पत्र भी लिखा फिर भोजन के लिए इंतजार कर रहे थे । फिर तो भोजन खिलाया । कहा - भल वतन में चीज़ें खाते हैं लेकिन यज्ञ के भोजन की रसना बहुत अच्छी है । फिर बाबा ने भोजन स्वीकार किया । जब हम आ रही थी - तो बाबा ने एक दृश्य दिखाया - एक सागर था जिसमें बहुत तेज लहरें चल रही थी ।

बाबा ने कहा आप इस सागर के बीच में जाओ । मैं घबराने लगी कि इतनी तेज लहरों में कैसे जाउंगी । फिर बाबा की आज्ञा प्रमाण पांव डाला । जहाँ पाँव रखा वहाँ की लहर शान्त होती गई । फिर देखा कि बापदादा दोनों ने उसमें छोटी-छोटी नावें उस सागर के बीच में डाली लेकिन सागर की लहर आने से गायब हो गई । कोई तो लहर से इधर-उधर होती रही । कोई तो जैसी थी वैसे ही रही हम यह देखने में ही बिजी हो गई। फिर वह सीन खत्म हो गई । बापदादा ने कहा कि यह खेल बाप ने प्रैक्टिकल में रचा है।

जिन बच्चों की जीवन रूपी नईया बाप के साथ में होगी वह हिलेगी नहीं । अभी तुम परीक्षाओं रूपी सागर के बीच में चल रहे हो । तो जिनका कनेक्शन अर्थात् जिनका हाथ बापदादा के हाथ में होगा उनकी यह जीवन रूपी नैया न हिलेगी न डूबेगी । तुम बच्चे इसको ड्रामा का खेल समझकर चलेंगे तो डगमग नहीं होंगे । और जिसका बुद्धि रूपी हाथ साथ ढीला होगा वह डोलते रहेंगे । इसलिए बच्चों को बुद्धि रूपी हाथ मजबूत रखने का खास ध्यान रखना है ।

मुरली पढ़ने के बाद परम शिक्षक सद्गुरु शिवबाबा से बताई गई विधि मनन चिंतन है।

मनन चिंतन करने की विधि, शिवबाबा चार मुरलीयों में बतायें हैं।

01-02-1979

23-12-1987

10-01-1988

07-04-1981

मनन शक्ति ही दिव्य बुद्धि की खुरक है।

हर वाक्य का रहस्य क्या है?, हर वाक्य को किस समय में?, किस विधि के द्वारा कार्य में प्रयोग करना है?, और हर वाक्य को दूसरे आत्माओं के प्रति सेवा में किस विधि से कार्य में लाना है?, ऐसे चार प्रकार से हर वाक्य को मनन करना है।

ज्ञान के मनन चिंतन के द्वारा समर्थ संकल्प, समर्थ स्थिति और शक्तिशाली स्मृति में रह सकते हैं।

ज्ञान की स्मृति (मनन चिंतन) द्वारा हमको ज्ञान दाता शिवबाबा की स्मृति स्वतः रहती है।

मनन चिन्तन करने के लिए उपयोगी संकल्प के लिए "समर्थ संकल्पों का खजाना" उपर के शिर्षकों में देखा जा सकता है।

मनन चिंतन मुरलीयों के लिए इस लिंक को स्पर्श करें।

निर्विघ्न भव!