रिवाइज कोर्स मुरली 26-06-1970      

                                                

निराकार ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप परमपिता शिवपरमात्मा इस धरती पर अवतरित होकर ज्ञान और योग से धर्म की स्थापन कर रहे हैं।

परम शिक्षक शिवपरमात्मा के द्वारा बताई गई इस ज्ञान मुरली को आत्मिक स्थिति में पढ़ना चाहिए।

आत्मिक स्थिति में आने के लिए किये जाने वाले संकल्प :

1. मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ, शिवबाबा मेरे परमपिता हैं।

2. मैं ईश्वरीय विद्यार्थि हूँ, बाबा मेरे टीचर हैं।

3. बाबा मेरे सद्गुरु हैं, मैं मास्टर सद्गुरु हूँ।

4. शिव परमात्मा मेरे जीवन साथी हैं, मैं शिव परमात्मा की जीवनसाथी हूँ।

5. सर्व संबंधों को बाबा से जोड़कर उस संबंध के कर्त्तव्य को ब्राह्मण जीवन में आचरण में लाने से आत्मिक स्थिति सहज हो जाती है।

आत्मिक स्थिति में, हर एक मुरली में, "बाबा मुरली मुझ से ही कह रहे हैं", ऐसे भाव से पढ़ना चाहिए।

कामधेनु का अर्थ” 

अपने को साक्षात्कार मूर्त समझती हो? मूर्ति के पास किसलिए जाते हैं? अपने मन की कामनाओं की पूर्ति के लिए । ऐसे साक्षात्कार मूर्त बने हो जो कोई आत्मा में किसी भी प्रकार की कामनाएं हों, उनकी पूर्ति कर सको । अल्पकाल की कामनाएं नहीं, सदाकाल की कामनाएं पूरी कर सकती हो? कामधेनु माताओं को कहा जाता है ना । कामधेनु का अर्थ ही है – सर्व की मनोकामनाएं पूरी करनेवाली । जिसकी अपनी सर्व कामनाएं पूरी होंगी, वही औरों की कामनाएं पूरी कर सकेंगी । सदैव यही लक्ष्य रखो कि हमको सर्व की कामनाएं पूर्ण करनेवाली मूर्ति बनना है । सर्व की इच्छाएं पूर्ण करने वाले स्वयं इच्छा मात्रं अविद्या होंगे । ऐसा अभ्यास करना है । प्राप्ति स्वरुप बनने से औरों को प्राप्ति करा सकते हो ।

तो सदैव अपने को दाता अथवा महादानी समझना है । महाज्ञानी बनने के बाद महादानी का कर्तव्य चलता है । महाज्ञानी की परख महादानी बनने से होती है । सैर करना अच्छा लगता है । जिन्हों को सैर करने की आदत होती है, वह सदैव सैर करते हैं । यहाँ भी ऐसे है । जितना स्वयं सैर करेंगे उतना औरों को भी बुद्धियोग से सैर कराएँगे । आप लोगों से साक्षात्कार होना है । जैसे साकार रूप के सामने आने से हरेक को भावना अनुसार साक्षात्कार वा अनुभव होता था । ऐसे आप लोगों द्वारा भी सेकंड बाई सेकंड अनेक अनुभव वा साक्षात्कार होंगे । ऐसे दर्शनीय मूर्त वा साक्षात्कार मूर्त तब बनेंगे जब अव्यक्त आकृति रूप दिखायेंगे । कोई भी सामने आये तो उसे शरीर न दिखाई दे लेकिन सूक्ष्मवतन में प्रकाशमय रूप दिखाई दे ।

 सिर्फ मस्तक की लाइट नहीं लेकिन सारे शरीर द्वारा लाइट के साक्षात्कार होंगे । जब लाइट ही लाइट देखेंगे तो स्वयं भी लाइट रूप हो जायेंगे ।

 

मुरली पढ़ने के बाद परम शिक्षक सद्गुरु शिवबाबा से बताई गई विधि मनन चिंतन है।

मनन चिंतन करने की विधि, शिवबाबा चार मुरलीयों में बतायें हैं।

01-02-1979

23-12-1987

10-01-1988

07-04-1981

मनन शक्ति ही दिव्य बुद्धि की खुरक है।

हर वाक्य का रहस्य क्या है?, हर वाक्य को किस समय में?, किस विधि के द्वारा कार्य में प्रयोग करना है?, और हर वाक्य को दूसरे आत्माओं के प्रति सेवा में किस विधि से कार्य में लाना है?, ऐसे चार प्रकार से हर वाक्य को मनन करना है।

ज्ञान के मनन चिंतन के द्वारा समर्थ संकल्प, समर्थ स्थिति और शक्तिशाली स्मृति में रह सकते हैं।

ज्ञान की स्मृति (मनन चिंतन) द्वारा हमको ज्ञान दाता शिवबाबा की स्मृति स्वतः रहती है।

मनन चिन्तन करने के लिए उपयोगी संकल्प के लिए "समर्थ संकल्पों का खजाना" उपर के शिर्षकों में देखा जा सकता है।

मनन चिंतन मुरलीयों के लिए इस लिंक को स्पर्श करें।

सदा मुक्तिधाता भव!