रिवाइज कोर्स मुरली 11-09-1971  

                                                

निराकार ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप परमपिता शिवपरमात्मा इस धरती पर अवतरित होकर ज्ञान और योग से धर्म की स्थापन कर रहे हैं।

परम शिक्षक शिवपरमात्मा के द्वारा बताई गई इस ज्ञान मुरली को आत्मिक स्थिति में पढ़ना चाहिए।

आत्मिक स्थिति में आने के लिए किये जाने वाले संकल्प :

1. मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ, शिवबाबा मेरे परमपिता हैं।

2. मैं ईश्वरीय विद्यार्थि हूँ, बाबा मेरे टीचर हैं।

3. बाबा मेरे सद्गुरु हैं, मैं मास्टर सद्गुरु हूँ।

4. शिव परमात्मा मेरे जीवन साथी हैं, मैं शिव परमात्मा की जीवनसाथी हूँ।

5. सर्व संबंधों को बाबा से जोड़कर उस संबंध के कर्त्तव्य को ब्राह्मण जीवन में आचरण में लाने से आत्मिक स्थिति सहज हो जाती है।

आत्मिक स्थिति में, हर एक मुरली में, "बाबा मुरली मुझ से ही कह रहे हैं", ऐसे भाव से पढ़ना चाहिए।

डबल रिफाइन स्टेज

आज बोलना है क्या? वा देखना है? क्या देखना ही बोलना नहीं है? ऐसा अनुभव है कि जो-कुछ बोलना हो वह मुंह से न बोल नयनों से बोलें? ऐसे हो सकता है? ऐसे होता भी है? आज यह मास्टर नॉलेजफुल, पावरफुल, सक्सेसफुल, सर्विसएबल की सभा है। तो क्या नयनों से नहीं जान सकेंगे? अपने मन की भावना वा बुद्धि के संकल्पों को नैनों से प्रकट नहीं कर सकते। यह भी तो पढ़ाई का पाठ है। तो बताओ, आज बापदादा क्या बोलने चाहते हैं? जानते हो ना। मास्टर नॉलेजफुल हो ना! तो यह पाठ जब पढ़ चुके हो, तो इसी पाठ का पेपर देने के लिये तैयार हो? महावीर तो हो ही। यह महावीरों का ग्रुप है ना। औरों की बैटरी को चार्ज करने वाले इन्चार्ज हैं।

 बापदादा तो देख रहे हैं कि यह सभी नम्बरवार पास हुए ग्रुप हैं। कई बातों को, कई अनुभवों को देखते, पास करते-करते पास नहीं हो गये हो? तीन प्रकार के ‘पास’ हैं। तो इन तीनों प्रकार के पास शब्द में पास होना है। एक होता है कोई बात वा रास्ते को पास करना, एक होता है पढ़ाई में पास होना और नज़दीक को भी पास कहते हैं। नजदीक अर्थात् समीप रत्न। तो तीनों प्रकार के पास शब्द में ‘पास’ हो? त्रिशूल का तिलक अर्थात् तीनों ही प्रकार के ‘पास’ शब्द में पास। यह तिलक नहीं दिखाई देता है? इस ग्रुप के मस्तक पर यह त्रिशूल का तिलक आप लोगों को दिखाई देता है? बापदादा को आज की सभा क्या दिखाई दे रही है, यह जानती हो?

अपना साक्षात्कार तो होता ही है ना। अभी-अभी का अपना साक्षात्कार हो रहा है? (दादी को) देखो, यह है साक्षात्कारमूर्त और आप हो साक्षी। तो बताओ, इन्हों के ग्रुप का कौनसा एक साक्षात्कार हो रहा है? यह (दादी) माइक है, आप (दीदी) माइट हो। ऐसे? यह माइट देती है, वह माइक बोलता है। बापदादा को क्या साक्षात्कार हो रहा है? क्यों, अभी डबल ताज नहीं है क्या? अगर डबल क्राउन धारण नहीं करेंगे तो भविष्य में भी डबल क्राउन तो मिल ही नहीं सकता। तो आज डबल ताजधारी, तिलकधारी, तख्तनशीन, राजऋषि दरबार देख रहे हैं। भविष्य की दरबार तो इस दरबार के आगे फीकी लगती है।

अगर अभी-अभी अपना संगमयुगी ताज, तिलक और तख्तनशीन पुरूषोत्तम, मर्यादा सम्पन्न स्वरूप देखो और साथ-साथ अपना भविष्य स्वरूप भी देखो; तो दोनों से कौनसा रूप स्पष्ट, आकर्षणमूर्त, अलौकिक, दिव्य वा रूहानी देखने में आयेगा? अभी का वा भविष्य का? तो अपने स्वरूपों का सदा साक्षात्कार करते और कराते रहते हो कि अभी पर्दे के अन्दर तैयार हो रहे हो? स्टेज पर नहीं आये हो? वर्तमान समय स्टेज पर किस रूप में रहते हो? अभी की अपनी स्टेज को कहां तक समझते हो? एक है फाइनल स्टेज। तो फाइनल है? फाइन है? रिफाइन है? आजकल मालूम है कि रिफाइन भी डबल रिफाइन होता है? तो अभी रिफाइन है?

डबल रिफाइन होना है वा रिफाइन होना है? एक बार का रिफाइन तो पूरा हो गया ना। अभी डबल रिफाइन होने आये हो। फाइनल की डेट कौनसी है? अगर पहले से नहीं होगी तो आप लोगों के भक्त और प्रजा आपके सम्पूर्ण स्वरूपों का साक्षात्कार कैसे करेंगे? फिर नहीं तो आप के चित्र भी टेढ़े-बांके बनायेंगे! अगर आपके सम्पूर्णता का, फाइनल स्टेज का साक्षात्कार नहीं करेंगे तो चित्र क्या बनायेंगे? चित्र भी रिफाइन नहीं बनायेंगे। तो पहले से ही अपना सम्पूर्ण साक्षात्कार कराना है। अभी आपके भक्तों में गुणगान करने के संस्कार भरेंगे तो द्वापरयुग में उतरते ही आपके चित्रों के आगे गुणगान करेंगे।

सब आत्माओं में सर्व रीति-रस्म के संस्कार तो अभी से ही भरने हैं ना, भरने का समय है। फिर है प्रैक्टिकल करने का समय। जैसे-जैसे आप आत्मा में सारे कल्प के पूज्य और पुजारीपन के दोनों ही संस्कार अभी भर रहे हैं। जितना पूज्य बनेंगे उसी प्रमाण पुजारीपन की स्टेज भी आटोमेटिकली बनती जायेगी। तो जैसे आप आत्माओं में सारे कल्प के संस्कार भरते हैं। वैसे ही आपके भक्तों में भी अभी ही संस्कार भरेंगे। तो जैसे आपका स्वरूप होगा वैसे ही संस्कार भरेंगे। इसलिए अभी जल्दी-जल्दी अपने को फाइनल स्टेज पर ले जाओ। ऐसी फाइनल स्टेज बनाओ जो अब भी फाइन न पड़े। जो डबल रिफाइन हो जायेंगे उनको फाइन नहीं पड़ेगा।

फाइनल वाले का कोई फाइल नहीं रह जाता। इसलिए जो भी कुछ फाइल रहा हुआ है उसको खत्म करो। अगर महावीरों को भी फाइन भरना पड़े तो महावीर ही क्या? इसलिए सुनाया कि आज बाेलना नहीं है। इशारे से ही समझने वाले हैं। यह तो ताज, तख्तनशीन ग्रुप है, तो वह सुनने से कैसे समझेंगे। अगर अभी भी कहने से करेंगे तो कहने से करने वाले तो मनुष्य होते हैं। आप लोग तो देवताओं से भी श्रेष्ठ हो। ब्राह्मण कहो वा फरिश्ते कहो। फरिश्ते ईशारे से समझते हैं। फर्श निवासी कहने से समझते हैं। अच्छा। बापदादा इस ग्रुप को सारे विश्व के सामने क्या समझते हैं? जो हो वही बताना है।

 यह तो सारी सृष्टि को शरणागत करने वाली हैं, न कि होने वाली। बापदादा के सामने भी शरणागत होने वाली नहीं हैं। बाप को सर्वेन्ट बनाने वाली हैं। तो शरणागत हुई वा शरणागत करने वाली हुई? सारी सृष्टि में जो भी महिमा करने योग्य शब्द हैं वह सभी हो। आज बापदादा सम्पूर्ण रूप देख रहे हैं। सदा फरमानबरदार उसको कहते हैं जो एक संकल्प भी बिगर फ़रमॉं के न करे। यह ग्रुप तो इसमें पास है ना। सदैव अपने को फरमानबरदार के स्वरूप में स्थित कर फिर कोई संकल्प करो। ऐसे जो सम्पूर्ण फरमानबरदार हैं वही सम्पूर्ण वफादार भी होते हैं। यह ग्रुप तो सम्पूर्णता के समीप है ना। सम्पूर्ण वफादारी किसको कहते हैं? वफादार का मुख्य गुण क्या होता है?

उनका मुख्य गुण होता है जो अपनी भले जान चली जाये लेकिन हर वस्तु की सम्भाल करेंगे। तो कोई भी चीज़ व्यर्थ नुकसान नहीं करेंगे। अगर संकल्प, समय, शब्द और कर्म - इन चारों में से कोई को भी व्यर्थ गंवाते हो वा नुकसान के खाते में जाता है तो उसको क्या सम्पूर्ण वफादार कहेंगे? क्योंकि जब से जन्म लिया अर्थात् फरमानबरदार, आज्ञाकारी बने, ईमानदार बने हैं? एक छोटे से पैसे में भी ईमानदार होता है। तो जब से जन्म लिया है तब से मन अर्थात् संकल्प, समय और कर्म जो भी करेंगे वह बाप के ईश्वरीय सेवा अर्थ करेंगे। यह प्रतिज्ञा की? सर्व समर्पण हुए हो? तो यह सभी बाप के ईश्वरीय सेवा अर्थ हो गई।

अगर ईश्वरीय सेवा की बजाय कहाँ संकल्प वा समय वा तन द्वारा व्यर्थ कार्य होता है तो उनको क्या कहेंगे? उनको सम्पूर्ण वफादार कहेंगे? यह नहीं समझना कि एक वा एक सेकेण्ड क्या बड़ी बात है। अगर एक नये पैसे की भी वफादारी नहीं तो उसको सम्पूर्ण वफादार नहीं कहेंगे। यह ग्रुप तो सम्पूर्ण फरमानबरदार, सम्पूर्ण वफादार है ना। ऐसे सम्पूर्ण वफादार, फरमानबरदार, ईमानदार, आज्ञाकारी ग्रुप को क्या कहेंगे? नमस्ते। नमस्ते के बाद फिर क्या होता है? बाप तो सम्पूर्ण आज्ञाकारी है। एक-दो को देख हर्षित हो रहे हो ना। संगमयुग के दरबार का यह श्रृंगार है। अच्छा।

मुरली पढ़ने के बाद परम शिक्षक सद्गुरु शिवबाबा से बताई गई विधि मनन चिंतन है।

मनन चिंतन करने की विधि, शिवबाबा चार मुरलीयों में बतायें हैं।

01-02-1979

23-12-1987

10-01-1988

07-04-1981

मनन शक्ति ही दिव्य बुद्धि की खुरक है।

हर वाक्य का रहस्य क्या है?, हर वाक्य को किस समय में?, किस विधि के द्वारा कार्य में प्रयोग करना है?, और हर वाक्य को दूसरे आत्माओं के प्रति सेवा में किस विधि से कार्य में लाना है?, ऐसे चार प्रकार से हर वाक्य को मनन करना है।

ज्ञान के मनन चिंतन के द्वारा समर्थ संकल्प, समर्थ स्थिति और शक्तिशाली स्मृति में रह सकते हैं।

ज्ञान की स्मृति (मनन चिंतन) द्वारा हमको ज्ञान दाता शिवबाबा की स्मृति स्वतः रहती है।

मनन चिन्तन करने के लिए उपयोगी संकल्प के लिए "समर्थ संकल्पों का खजाना" उपर के शिर्षकों में देखा जा सकता है।

मनन चिंतन मुरलीयों के लिए इस लिंक को स्पर्श करें।

महा भाग्यवान भव!