रिवाइज कोर्स मुरली 16-07-1972
निराकार ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप परमपिता शिवपरमात्मा इस धरती पर अवतरित होकर ज्ञान और योग से धर्म की स्थापन कर रहे हैं।
परम शिक्षक शिवपरमात्मा के द्वारा बताई गई इस ज्ञान मुरली को आत्मिक स्थिति में पढ़ना चाहिए।
आत्मिक स्थिति में आने के लिए किये जाने वाले संकल्प :
1. मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ, शिवबाबा मेरे परमपिता हैं।
2. मैं ईश्वरीय विद्यार्थि हूँ, बाबा मेरे टीचर हैं।
3. बाबा मेरे सद्गुरु हैं, मैं मास्टर सद्गुरु हूँ।
4. शिव परमात्मा मेरे जीवन साथी हैं, मैं शिव परमात्मा की जीवनसाथी हूँ।
5. सर्व संबंधों को बाबा से जोड़कर उस संबंध के कर्त्तव्य को ब्राह्मण जीवन में आचरण में लाने से आत्मिक स्थिति सहज हो जाती है।
आत्मिक स्थिति में, हर एक मुरली में, "बाबा मुरली मुझ से ही कह रहे हैं", ऐसे भाव से पढ़ना चाहिए।
स्वच्छ और आत्मिक बल वाली आत्मा ही आकर्षण मूर्त्त है
अपने को इस श्रेष्ठ ड्रामा के अन्दर हीरो एक्टर और मुख्य एक्टर समझते हो? मुख्य एक्टर्स के तरफ सभी का अटेन्शन होता है। तो हर सेकेण्ड की एक्ट अपने को मुख्य एक्टर समझते हुये बजाते हो? जो नामीग्रामी एक्टर्स होते हैं उन्हों में मुख्य 3 बातें होती हैं। वह कौनसी हैं? एक तो वह एक्टिव होगा, दूसरा एक्युरेट होगा और अट्रेक्टिव होगा। यह तीनों बातें नामी-ग्रामी एक्टर्स में अवश्य होती हैं। तो ऐसे अपने को नामीग्रामी वा मुख्य एक्टर समझते हो? अट्रेक्ट किस बात पर करेंगे? हर कर्म में, हर चलन में रूहानियत की अट्रेक्शन हो। जैसे कोई शरीर में सुन्दर होता है तो वह भी अट्रैक्शन करते हैं ना अपने तरफ।
ऐसे ही जो आत्मा स्वच्छ है, आत्मिक-बल वाली है, वह भी अपने तरफ आकर्षित करते हैं। जैसे आत्मा-ज्ञानी महात्माएं आदि भी द्वापर आदि में अपने सतोप्रधान स्थिति वाले थे तो उन्हों में भी रूहानी आकर्षण तो था ना, जो अपने तरफ आकर्षित करके औरों को भी इस दुनिया से अल्पकाल के लिये वैराग्य तो दिला देते थे ना। जब उलटे ज्ञान वालों में भी इतनी अट्रैक्शन थी, तो जो यथार्थ और श्रेष्ठ ज्ञान-स्वरूप हैं उन्हों में भी रूहानी आकर्षण वा अट्रैक्शन रहेगी। शारीरिक ब्यूटी नजदीक वा सामने आने से आकर्षण करेगी। रूहानी आकर्षण दूर बैठे भी किसी आत्मा को अपने तरफ आकर्षित करती। इतनी अट्रैक्शन अर्थात् रूहानियत अपने आप में अनुभव करते हो?
ऐसे ही फिर एक्युरेट भी हो। एक्युरेट किसमें? जो मन्सा अर्थात् संकल्प के लिये भी श्रीमत मिली हुई है - वाणी के लिये भी जो श्रीमत मिली हुई है और कर्म के लिये भी जो श्रीमत मिली हुई है इन सभी बातों में एक्युरेट। मन्सा भी अनएक्युरेट न हो। जो नियम हैं, मर्यादा हैं, जो डायरेक्शन हैं उन सभी में एक्युरेट और एक्टिव। जो एक्टिव होता है वह जिस समय जैसा अपने को बनाने चाहे, चलाने चाहे वह चला सकते हैं वा ऐसा ही रूप धारण कर सकते हैं। तो जो मुख्य पार्टधारी है उन्हों में यह तीनों ही विशेषताएं भरी हुई रहती हैं। इसमें ही देखना है कि इन में से कौनसी विशेषता किस परसेन्टेज में कम है? स्टेज के साथ-साथ परसेन्टेज को भी देखना है।
रूहानियत है, आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन जितनी परसेन्टेज होनी चाहिए वह है? अगर परसेन्टेज की कमी है तो इसको सम्पूर्ण तो नहीं कहेंगे न्। पास तो हो गये, फिर भी मार्क्स के आधार पर नंबर तो होते हैं ना। थर्ड डिवीजन वाले को भी पास तो कहते हैं लेकिन कहाँ थर्ड वाला, कहाँ फर्स्ट क्लास - फर्क तो है ना। तो अब चेक करना परसेन्टेज को। स्टेज तो अब नेचरल बात हो गई। क्योंकि प्रैक्टिकल एक्ट में स्टेज पर हो ना। अब सिर्फ परसेन्टेज के आधार पर नंबर होने हैं। आज बहुत बड़ा संगठन हो गया है। जैसे बाप को भी समान बच्चे प्रिय लगते हैं, आप लोग आपस में भी एक समान मिलते हो तो यह सितारों का मेला भी बहुत अच्छा लगता है ना।
संगमयुगी मेला तो है ही। लेकिन उस मेले में भी यह मेला है। मेले के अन्दर जो विशेष मेला लगता है वह फिर ज्यादा प्रिय लगता है। बड़े बड़े मेलों के अन्दर भी फिर एक विशेष स्थान बनाते हैं जहाँ सभी का मिलन होता है। संगमयुग बेहद का मेला तो है ही लेकिन उसके अन्दर भी यह स्थूल विशेष स्थान है, जहाँ समान आत्माएं आपस में मिलती हैं। हरेक को अपने समान वा समीप आत्माओं से मिलना- जुलना अच्छा लगता है।
विशेष आत्माओं से मेला बनाने लिये स्वयं को भी विशेष बनना पड़े। कोई विशेष हो, कोई साधारण हो, वह कोई मेला नहीं कहा जाता। बाप के समान दिव्य धारणाओं की विशेषता धारण करनी है। बाप से जो पालना ली है इसका सबूत देना है। बाप ने पालना किस लिये की? विशेषताएं भरने लिये। लक्ष्य हो और लक्षण न आवे; तो इसको क्या कहा जाये? ज्यादा समझदार। एक होते हैं समझदार, दूसरे होते हैं बेहद के समझदार। बेहद में कोई लिमिट नहीं होती है। अच्छा!
मुरली पढ़ने के बाद परम शिक्षक सद्गुरु शिवबाबा से बताई गई विधि मनन चिंतन है।
मनन चिंतन करने की विधि, शिवबाबा चार मुरलीयों में बतायें हैं।
01-02-1979
23-12-1987
10-01-1988
07-04-1981
मनन शक्ति ही दिव्य बुद्धि की खुरक है।
हर वाक्य का रहस्य क्या है?, हर वाक्य को किस समय में?, किस विधि के द्वारा कार्य में प्रयोग करना है?, और हर वाक्य को दूसरे आत्माओं के प्रति सेवा में किस विधि से कार्य में लाना है?, ऐसे चार प्रकार से हर वाक्य को मनन करना है।
ज्ञान के मनन चिंतन के द्वारा समर्थ संकल्प, समर्थ स्थिति और शक्तिशाली स्मृति में रह सकते हैं।
ज्ञान की स्मृति (मनन चिंतन) द्वारा हमको ज्ञान दाता शिवबाबा की स्मृति स्वतः रहती है।
मनन चिन्तन करने के लिए उपयोगी संकल्प के लिए "समर्थ संकल्पों का खजाना" उपर के शिर्षकों में देखा जा सकता है।
मनन चिंतन मुरलीयों के लिए इस लिंक को स्पर्श करें।