रिवाइज कोर्स मुरली 08-06-1973  

                                                

निराकार ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप परमपिता शिवपरमात्मा इस धरती पर अवतरित होकर ज्ञान और योग से धर्म की स्थापन कर रहे हैं।

परम शिक्षक शिवपरमात्मा के द्वारा बताई गई इस ज्ञान मुरली को आत्मिक स्थिति में पढ़ना चाहिए।

आत्मिक स्थिति में आने के लिए किये जाने वाले संकल्प :

1. मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ, शिवबाबा मेरे परमपिता हैं।

2. मैं ईश्वरीय विद्यार्थि हूँ, बाबा मेरे टीचर हैं।

3. बाबा मेरे सद्गुरु हैं, मैं मास्टर सद्गुरु हूँ।

4. शिव परमात्मा मेरे जीवन साथी हैं, मैं शिव परमात्मा की जीवनसाथी हूँ।

5. सर्व संबंधों को बाबा से जोड़कर उस संबंध के कर्त्तव्य को ब्राह्मण जीवन में आचरण में लाने से आत्मिक स्थिति सहज हो जाती है।

आत्मिक स्थिति में, हर एक मुरली में, "बाबा मुरली मुझ से ही कह रहे हैं", ऐसे भाव से पढ़ना चाहिए।

सर्वश्रेष्ठ शक्ति-परखने की शक्ति  

सर्वशक्तियाँ भरने वाले, सर्वशक्तिवान् शिव बाबा बोले:-

सर्व-शक्तियों में से विशेष शक्ति को जानते हो? अपने को मास्टर सर्वशक्तिवान् तो समझते हो ना? सर्वशक्तियों में से सर्व श्रेष्ठ शक्ति कौन-सी है। जैसे पढ़ाई में अनेक सब्जेक्टस् होते हैं लेकिन उनमें से एक विशेष होता है। वैसे ही सर्व-शक्तियाँ आवश्यक तो हैं लेकिन इन शक्तियों में से सभी से श्रेष्ठ शक्ति कौन-सी है? जो आवश्यक हैं, जिसके बगैर महारथी व महावीर बनना मुश्किल है। हैं तो सभी आवश्यक। एक का दूसरे से सम्बन्ध है लेकिन फिर भी नम्बर वन जो सर्वशक्तियों को नजदीक लाने वाली है वह कौन-सी है? (परखने की शक्ति)।

सैल्फ रिअलाइजेशन करना भी परखने की शक्ति है। सैल्फ रिइलाइजेशन का अर्थ ही है-अपने आप को परखना व जानना। पहले बाप को परखेंगे तब जानेंगे या पहचान सकेंगे। और जब पहचानेंगे तब बाप के समीप व समान बन सकेंगे। परखने की शक्ति है नम्बरवन। परखना जिसको कामन शब्दों में पहचान कहते हैं। पहले-पहले ज्ञान का आधार ही है बाप को पहचानना अर्थात् परखना कि यह बाप का कर्त्तव्य चल रहा है। पहले परखने की शक्ति आवश्यक है। परखने की शक्ति को नॉलेजफुल  की स्टेज कहते है।

परखने की शक्ति का विस्तार क्या है और उससे प्राप्ति क्या-क्या होती हैं? इस विषय पर आपस में रूह-रूहान कर सकते हो। आपस में हम सरीखे खेलने वाले होते हैं तो खेल में भी मजा अता हैं। खेल-खेल में मेल भी हो जाता है। इस खेल में भी आपस में खेलते-खेलते दोस्त बन जाते हैं। वह हुआ स्थूल खेल। यहाँ भी खेल-खेल में आत्माओं की समीपता का मेल होता है। आत्माओं के संस्कार स्वभाव का मेल होता है। खेल के साथी बहुत पक्के होते स 69 हैं, जीवन के अन्त तक अपना साथ निभाते हैं। रूहानी खेल के साथ अन्त तक आपस में मेल निभाते हो, तब तो इस मेल की निशानी ‘माला’ बनी हुई है।

 सभी बातों में जब अन्त में एक दूसरे के समीप हो जाते, मेल हो जाता तब दाना दाने से मिल माला बनती है। यह मेल की निशानी (माला) है। अच्छा! ओम् शान्ति।

मुरली पढ़ने के बाद परम शिक्षक सद्गुरु शिवबाबा से बताई गई विधि मनन चिंतन है।

मनन चिंतन करने की विधि, शिवबाबा चार मुरलीयों में बतायें हैं।

01-02-1979

23-12-1987

10-01-1988

07-04-1981

मनन शक्ति ही दिव्य बुद्धि की खुरक है।

हर वाक्य का रहस्य क्या है?, हर वाक्य को किस समय में?, किस विधि के द्वारा कार्य में प्रयोग करना है?, और हर वाक्य को दूसरे आत्माओं के प्रति सेवा में किस विधि से कार्य में लाना है?, ऐसे चार प्रकार से हर वाक्य को मनन करना है।

ज्ञान के मनन चिंतन के द्वारा समर्थ संकल्प, समर्थ स्थिति और शक्तिशाली स्मृति में रह सकते हैं।

ज्ञान की स्मृति (मनन चिंतन) द्वारा हमको ज्ञान दाता शिवबाबा की स्मृति स्वतः रहती है।

मनन चिन्तन करने के लिए उपयोगी संकल्प के लिए "समर्थ संकल्पों का खजाना" उपर के शिर्षकों में देखा जा सकता है।

मनन चिंतन मुरलीयों के लिए इस लिंक को स्पर्श करें।

सदा सफलतामूर्त भव!