रिवाइज कोर्स मुरली 18-01-1973  

                                                

निराकार ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप परमपिता शिवपरमात्मा इस धरती पर अवतरित होकर ज्ञान और योग से धर्म की स्थापन कर रहे हैं।

परम शिक्षक शिवपरमात्मा के द्वारा बताई गई इस ज्ञान मुरली को आत्मिक स्थिति में पढ़ना चाहिए।

आत्मिक स्थिति में आने के लिए किये जाने वाले संकल्प :

1. मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ, शिवबाबा मेरे परमपिता हैं।

2. मैं ईश्वरीय विद्यार्थि हूँ, बाबा मेरे टीचर हैं।

3. बाबा मेरे सद्गुरु हैं, मैं मास्टर सद्गुरु हूँ।

4. शिव परमात्मा मेरे जीवन साथी हैं, मैं शिव परमात्मा की जीवनसाथी हूँ।

5. सर्व संबंधों को बाबा से जोड़कर उस संबंध के कर्त्तव्य को ब्राह्मण जीवन में आचरण में लाने से आत्मिक स्थिति सहज हो जाती है।

आत्मिक स्थिति में, हर एक मुरली में, "बाबा मुरली मुझ से ही कह रहे हैं", ऐसे भाव से पढ़ना चाहिए।

"समानता और समीपता"

सदा निर्मान और निर्माण करने के कार्य में सदा तत्पर रहने वाले और बच्चों को आप-समान स्वमान-धारी बनाने वाले शिव बाबा बोले:-

क्या बापदादा समान स्वमान-धारी, स्वदर्शन-चक्रधारी और निर्मान बने हो? जितना-जितना इन विशेष धारणाओं में समान बनते जाते हो उतना ही समय को समीप लाते हो। समय को जानने के लिये अभी कितना समय पड़ा है? इसकी परख - आपकी धारणाओं में समान स्थिति है। अब बताओ कि समय कितना समीप है? समानता में समीप हो तो समय भी समीप है। इस प्रोग्राम के बीच अपने-आपको परखने व अपने द्वारा समय को जानने का समय मिला है। इस विशेष मास के अन्दर दो मुख्य बातें मुख्य रूप से लक्ष्य के रूप में सामने रखनी हैं। वो कौन-सी? एक तो लव (Love) और दूसरा लवलीन।

कर्म में, वाणी में, सम्पर्क में व सम्बन्ध में लव और स्मृति में व स्थिति में लवलीन रहना है। जो जितना लवली (Lovely) होगा, वह उतना ही लवलीन रह सकता है। इस लवलीन स्थिति को मनुष्यात्माओं ने लीन की अवस्था कह दिया है। बाप में लव खत्म करके सिर्फ लीन शब्द को पकड़ लिया है। तो इस मास के अन्दर इन दोनों ही मुख्य विशेषताओं को धारण कर बापदादा समान बनना है। बापदादा की मुख्य विशेषता, जिसने कि आप सबको विशेष बनाया, सब-कुछ भुलाया और देही-अभिमानी बनाया, वह यही थी - लव और लवलीन। लव ने आप सबको भी एक सेकेण्ड में 5000 वर्ष की विस्मृत हुई बातों को स्मृति में लाया है, सर्व सम्बन्ध में लाया है, सर्वस्व त्यागी बनाया है।

जबकि बाप ने एक ही विशेषता से एक ही सेकेण्ड में अपना बना लिया तो आप सब भी इस विशेषता को धारण कर बाप-समान बने हो? जबकि साकार बाप में इस विशेषता में परसेन्टेज (Percentage) नहीं देखी, परफेक्ट (Perfect) ही देखा तो आप विशेष आत्माओं को और बाप समान बनी हुई आत्माओं को भी परफेक्ट होना है। इस मुख्य विशेषता में परसेन्टेज नहीं होनी चाहिए। परफेक्ट होना है, क्योंकि इस द्वारा ही सर्व आत्माओं के भाग्य व लक्क को जगा सकते हो। लक्क (Luck) के लॉक (Lock) की चाबी (Key) कौन-सी है?-’लव’। लव ही लॉक की ‘की’ (Key) है। यह ‘मास्टर-की’ (Master Key) है। कैसे भी दुर्भाग्यशाली को भाग्यशाली बनाती है। क्या इसके स्वयं अनुभवी हो?

जितना-जितना बापदादा से लव जुटता है, उतना ही बुद्धि का ताला खुलता जाता है। लव कम तो लक्क भी कम। तो सर्व आत्माओं के लक्क के लॉक को खोलने वाली चाबी आपके पास है? कहीं इस लक्क की चाबी को खो तो नहीं देते हो? या माया भिन्न-भिन्न रूपों व रंगों में इस चाबी को चुरा तो नहीं लेती है? माया की भी नजर इसी चाबी पर है। इसलिये इस चाबी को सदा कायम रखना है। लव अनेक वस्तुओं में होता है। यदि कोई भी वस्तु में लव है तो बाप से लव परसेन्टेज में हो जाता है। अपनी देह में, अपनी कोई भी वस्तु में यदि अपनापन है तो समझो कि लव में परसेन्टेज है। अपनेपन को मिटाना ही बाप की समानता को लाना है। जहाँ अपनापन है, वहाँ बापदादा सदा साथ नहीं हैं।

परसेन्टेज वाला कभी भी परफेक्ट नहीं बन सकता। परसेन्टेज अर्थात् डिफेक्ट (DEFECT) वाला कभी परफेक्ट नहीं बन सकता, इसलिये इस वर्ष में परसेन्टेज को मिटा कर परफेक्ट बनो। तब यह वर्ष विनाश की वर्षा लायेगा। एक वर्ष का समय दे रहे हैं जो कि फिर यह उलहना न दें कि ‘‘हमको क्या पता’’? एक वर्ष अनेक वर्षों की श्रेष्ठ प्रारब्ध बनाने के निमित्त है। अपने आप ही चेकर (Checker) बन अपने आप को चेक  करना।

अगर मुख्य इस बात में अपने को परफेक्ट बनाया तो अनेक प्रकार के डिफेक्ट स्वत: ही समाप्त हो जायेंगे। यह तो सहज पुरूषार्थ है ना? अगर स्वयं बाप के साथ लव में लवलीन रहेंगे तो औरों को भी सहज ही आप-समान व बाप-समान बना सकेंगे। तो यह वर्ष बाप-समान बनने का लक्ष्य रख कर चलेंगे, तो बापदादा भी ऐसे बच्चों को ‘‘तत् त्वम्’’ का वरदान देने के लिये ड्रामानुसार निमित्त बना हुआ है। इस वर्ष की विशेषता बाप-समान बन समय को समीप लाने का है। समय की विशेषता को स्वयं में लाना है।

ऐसे सदा लवली-लवलीन रहने वाले, बाप-समान निर्मान और निर्माण करने के कर्त्तव्य में सदा तत्पर रहने वाले,समय की विशेषता को स्वयं में लाने वाले, श्रेष्ठ स्वमान में सदा स्थित रहने वाले, श्रेष्ठ और समान आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते। ओम शान्ति।

इस वाणी का सार

1. यदि कोई भी वस्तु में और अपनी देह में अपना-पन है तो जरूर बाप से लव में परसेन्टेज है, अपने-पन को मिटाना ही स्वयं में बाप की समानता को लाना है।

2. दो मुख्य बातें लक्ष्य रूप में सामने रखनी हैं। एक तो ‘लव’, दूसरा- ‘लवलीन’। जो जितना लवली होगा, वह उतना ही लवलीन रह सकता है।

मुरली पढ़ने के बाद परम शिक्षक सद्गुरु शिवबाबा से बताई गई विधि मनन चिंतन है।

मनन चिंतन करने की विधि, शिवबाबा चार मुरलीयों में बतायें हैं।

01-02-1979

23-12-1987

10-01-1988

07-04-1981

मनन शक्ति ही दिव्य बुद्धि की खुरक है।

हर वाक्य का रहस्य क्या है?, हर वाक्य को किस समय में?, किस विधि के द्वारा कार्य में प्रयोग करना है?, और हर वाक्य को दूसरे आत्माओं के प्रति सेवा में किस विधि से कार्य में लाना है?, ऐसे चार प्रकार से हर वाक्य को मनन करना है।

ज्ञान के मनन चिंतन के द्वारा समर्थ संकल्प, समर्थ स्थिति और शक्तिशाली स्मृति में रह सकते हैं।

ज्ञान की स्मृति (मनन चिंतन) द्वारा हमको ज्ञान दाता शिवबाबा की स्मृति स्वतः रहती है।

मनन चिन्तन करने के लिए उपयोगी संकल्प के लिए "समर्थ संकल्पों का खजाना" उपर के शिर्षकों में देखा जा सकता है।

मनन चिंतन मुरलीयों के लिए इस लिंक को स्पर्श करें।

सदा प्रेम स्वरूप भव!