रिवाइज कोर्स मुरली 23-01-1974
निराकार ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप परमपिता शिवपरमात्मा इस धरती पर अवतरित होकर ज्ञान और योग से धर्म की स्थापन कर रहे हैं।
परम शिक्षक शिवपरमात्मा के द्वारा बताई गई इस ज्ञान मुरली को आत्मिक स्थिति में पढ़ना चाहिए।
आत्मिक स्थिति में आने के लिए किये जाने वाले संकल्प :
1. मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ, शिवबाबा मेरे परमपिता हैं।
2. मैं ईश्वरीय विद्यार्थि हूँ, बाबा मेरे टीचर हैं।
3. बाबा मेरे सद्गुरु हैं, मैं मास्टर सद्गुरु हूँ।
4. शिव परमात्मा मेरे जीवन साथी हैं, मैं शिव परमात्मा की जीवनसाथी हूँ।
5. सर्व संबंधों को बाबा से जोड़कर उस संबंध के कर्त्तव्य को ब्राह्मण जीवन में आचरण में लाने से आत्मिक स्थिति सहज हो जाती है।
आत्मिक स्थिति में, हर एक मुरली में, "बाबा मुरली मुझ से ही कह रहे हैं", ऐसे भाव से पढ़ना चाहिए।
अब शक्ति सेना नाम को सार्थक बनाओ
निर्बल आत्मा को शक्ति देने वाले शक्तिदाता, चढ़ती कला की ओर ले जाने वाले रूहानी पण्डे और सब आधारों से निराधार बनाने वाले निराकार शिव बाबा शक्तियों के संगठन को सम्बोधित करते हुए बोले:-
क्या आप अपने को शक्ति सेना की वारियर (योद्धा) समझती हो? जैसे आपके संगठन का नाम है-शक्ति-सेना, क्या वैसी आप अपने को शक्ति समझती हो? यह नाम तो आपका परिचय देता है, क्योंकि यह कर्त्तव्य के आधार पर है। शक्ति सेना का अर्थ है -- सर्व-शक्तियों से सम्पन्न आत्माओं का संगठन। तो प्रश्न है कि जैसे नाम परिचय सिद्ध करता है तो क्या वैसे प्रैक्टिकल में कर्त्तव्य भी हैं?’’
सर्व-शक्ति सम्पन्न बनने की युक्ति बताते हुए बाबा बोले-’’सदा यह स्मृति में रखो कि बाप1 का नाम2 क्या है और बाप की महिमा क्या है? फिर उसके बाद यह विचार करो, कि जो बाप का काम3 है, क्या वही मेरा भी काम है? अगर बाप के नाम को सिद्ध करने वाला काम न किया, तो बाप का नाम बाला4 कैसे करोगी?
1. परमपति परमात्मा; 2. गुणवाचक नाम 3. सर्व का कल्याण करने का दिव्य कर्म; 4. उच्च; प्रसिद्ध) यह सोचो, कि बाप की यह जो महिमा है, कि वह सर्वशक्तिवान है तो वैसा ही मेरा भी स्वरूप हो, क्योंकि बाप की महिमा के अनुसार ही तो अपना स्वरूप बनाना है। बाप सर्वशक्तिमान हो और बच्चे शक्तिहीन; बाप नॉलेजफुल (ज्ञानसागर) हो और बच्चे अनपढ़-यह शोभेगा क्या?’’
यह देखना है कि हर सेकेण्ड चढ़ती कला की तरफ हैं? एक सेकेण्ड भी चढ़ती कला के बजाय ठहरती कला न हो, गिरती कला की तो बात ही नहीं। आप हो पण्डे। अगर पण्डे ठहरती कला में आ गये वा रूक गये तो आपके पीछे जो विश्व की आत्माएं चलने वाली हैं वे सब रूक जावेंगी। अगर इंजन ठहर जाय तो साथ ही डब्बे तो स्वत: ही ठहर जावेंगे। आप सबके पीछे विश्व की आत्मायें हैं। आप लोगों का एक सेकेण्ड भी रूकना साधारण बात नहीं है, क्या इतनी ज़िम्मेवारी समझ कर चलती हो? विशेष स्थान पर और विशेष स्थान के रूप में सबकी नजरों में हो न? तो जब ड्रामानुसार विशेष स्थान पर विशेष पार्ट बजाने का चान्स मिला है तो अपने विशेष पार्ट को महत्व दे चलना चाहिए न?
अगर अपना महत्व न रखेंगे, तो अन्य भी आपका महत्व नहीं रखेंगे। इसलिये अब अपने पार्ट के महत्व को जानो। हमारे ऊपर कोई ज़िम्मेवारी नहीं, अब यह संकल्प भी नहीं करना है। आप लोगों को देखकर कोई सौदा करता है, तो सौदा कराने वाले आप हो न? यह तो अन्डरस्टुड (समझ) है कि अगर स्थापना की तैयारी कम है, तो विनाश की तैयारी कैसे होगी? इन दोनों का आपस में कनेक्शन (सम्बन्ध) है न? समय पर तैयार हो ही जावेंगे, यह समझना भी राँग (गलत) है। अगर बहुत समय से महाविनाश का सामना करने की तैयारी का अभ्यास न होगा तो उस समय भी सफल न हो सकेंगे। इसका बहुत समय से अभ्यास चाहिए; नहीं तो इतने वर्ष अभ्यास के क्यों दिये गये हैं?
बहुत समय का कनेक्शन है, इसलिए ही ड्रामानुसार बहुत समय पुरूषार्थ के लिए भी मिला है। बहुत समय की प्राप्ति के लिये बहुत समय से पुरूषार्थ भी करना है, क्या ऐसे बहुत समय का पुरूषार्थ है? साइंस वालों को महाविनाश के लिये ऑर्डर करें? एक सेकेण्ड की ही तो बात है, इशारा मिला और किया। क्या ऐसे ही शक्ति-सेना तैयार है? एक सेकेण्ड का इशारा है--सदा देही-अभिमानी। अल्पकाल के लिये नहीं, सदा काल के लिए हो जाओ। ऐसा इशारा मिले तो आप क्या देही अभिमानी हो जावेंगे या फिर उस समय साधन ढूढेंगे, प्वाइन्टस् सोचेंगे या अपने को ठहराने की कोशिश करेंगे? इसलिए अभी से ऐसा पुरूषार्थ करो। मिलिट्री को तो अचानक ही ऑर्डर मिलते हैं न?
अपने आप प्रोग्राम बनाओ और स्वयं ही स्वयं की उन्नति करो। प्रोग्राम बनेगा तो कर लेंगे, यह भी आधार मत रखो। भट्ठी बनेगी तो तीन दिन अच्छे बीतेंगे, इसमें तो संगठन का सहयोग मिलता है। लेकिन यह आधार भी नहीं। कभी सहयोग मिल सकता है और कभी नहीं भी मिल सकता है। अभ्यास निराधार का होना चाहिए। अगर चान्स मिल जाता है, तो अच्छा ही है। न मिलने पर भी, अभ्यास से हटना नहीं चाहिए। प्रोग्राम के आधार पर, अपनी उन्नति का आधार बनाना, यह भी कमज़ोरी है। यह तो अनादि प्रोग्राम मिला हुआ है न? वह क्यों नहीं याद रखते हो? हर वक्त भट्ठी में रहना है, यह तो अनादि प्रोग्राम मिला हुआ है न? अच्छा!
जैसा अपना नाम वैसा काम करने वाले, बाप का नाम बाला करने वाले, एक सेकेण्ड में आर्डर मिलने पर तैयार हो जाने वाले और निराधार होकर पुरूषार्थ करने वाले रूहानी सैनानियों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
मुरली पढ़ने के बाद परम शिक्षक सद्गुरु शिवबाबा से बताई गई विधि मनन चिंतन है।
मनन चिंतन करने की विधि, शिवबाबा चार मुरलीयों में बतायें हैं।
01-02-1979
23-12-1987
10-01-1988
07-04-1981
मनन शक्ति ही दिव्य बुद्धि की खुरक है।
हर वाक्य का रहस्य क्या है?, हर वाक्य को किस समय में?, किस विधि के द्वारा कार्य में प्रयोग करना है?, और हर वाक्य को दूसरे आत्माओं के प्रति सेवा में किस विधि से कार्य में लाना है?, ऐसे चार प्रकार से हर वाक्य को मनन करना है।
ज्ञान के मनन चिंतन के द्वारा समर्थ संकल्प, समर्थ स्थिति और शक्तिशाली स्मृति में रह सकते हैं।
ज्ञान की स्मृति (मनन चिंतन) द्वारा हमको ज्ञान दाता शिवबाबा की स्मृति स्वतः रहती है।
मनन चिन्तन करने के लिए उपयोगी संकल्प के लिए "समर्थ संकल्पों का खजाना" उपर के शिर्षकों में देखा जा सकता है।
मनन चिंतन मुरलीयों के लिए इस लिंक को स्पर्श करें।