रिवाइज कोर्स मुरली 24-06-1974  

                                                

निराकार ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप परमपिता शिवपरमात्मा इस धरती पर अवतरित होकर ज्ञान और योग से धर्म की स्थापन कर रहे हैं।

परम शिक्षक शिवपरमात्मा के द्वारा बताई गई इस ज्ञान मुरली को आत्मिक स्थिति में पढ़ना चाहिए।

आत्मिक स्थिति में आने के लिए किये जाने वाले संकल्प :

1. मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ, शिवबाबा मेरे परमपिता हैं।

2. मैं ईश्वरीय विद्यार्थि हूँ, बाबा मेरे टीचर हैं।

3. बाबा मेरे सद्गुरु हैं, मैं मास्टर सद्गुरु हूँ।

4. शिव परमात्मा मेरे जीवन साथी हैं, मैं शिव परमात्मा की जीवनसाथी हूँ।

5. सर्व संबंधों को बाबा से जोड़कर उस संबंध के कर्त्तव्य को ब्राह्मण जीवन में आचरण में लाने से आत्मिक स्थिति सहज हो जाती है।

आत्मिक स्थिति में, हर एक मुरली में, "बाबा मुरली मुझ से ही कह रहे हैं", ऐसे भाव से पढ़ना चाहिए।

राजयोगी ही विश्व-राज्य के अधिकारी

सर्व श्रेष्ठ, सहजयोगी, राजयोगी, कर्मयोगी, ज्ञानयोगी बना, गायन योग्य व पूजन योग्य बनाने वाले, सदा पूज्य योगेश्वर शिव बाबा बोले :-

क्या आप सभी अपने को योगी समझते हो? क्या योगी का टाइटल आप सभी को मिल गया है? योगी होते हुए भी आप सभी एक जैसे योगी तो नहीं बल्कि नम्बरवार हो। जैसे कोई भी पढ़ाई पढ़ने के बाद परीक्षा पास करने का सार्टिफिकेट मिलता है, और डिग्री का सार्टिफिकेट मिलता तो कहलाने में भी वही नाम आता है, जैसे कि वकील है वा डाक्टर है। ऐसे ही यहाँ भी, जब नॉलेजफुल बाप के द्वारा योगी और भोगी जीवन की नॉलेज मिली है, तो भोगी के बाद मरजीवा बने तो यहाँ भी ब्रह्माकुमार व ब्रह्माकुमारी का टाइटल मरजीवा बनने के बाद स्वत: ही मिल जाता है और वैसे ही योगी का भी टाइटल परन्तु नम्बरवार मिलता है। बाकी इसमें भी क्या फर्क है?

जैसे योग की महिमा करते हैं कि वह सहजयोग, निरन्तर योग, कर्म योग, व ज्ञान योग और बुद्धियोग है। फिर उसकी भी उपमा करते हैं न? जैसे कि डाक्टर्स में और मिलिट्री में भी भिन्न-भिन्न प्रकार के ग्रेड्स होते हैं। उसी रीति यहाँ भी योगियों में कर्मयोगी और बुद्धियोगी हैं। यहाँ भी कोई तो सभी लक्षणधारी हैं और कोई एक या दो, लेकिन सब नहीं। जैसे कि किसी का बुद्धि का योग है लेकिन उसका कर्मयोग नहीं है या फिर किसी का कर्मयोग है तो वह सहजयोगी नहीं। या जो ज्ञान में सदा नहीं रहता तो उसको ज्ञानयोगी नहीं कहेंगे। यहाँ भी एक ही टाइटल मिलेगा तो आप जो योग की महिमा औरों को सुनाते हो, तो वह स्वयं में धारण करो।

जैसे राजयोग अर्थात् जो कर्मेन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर उन पर राज्य करता है, तो वह भविष्य में भी श्रेष्ठ पद को पाता है। राजयोगी का अगर पॉवरफुल योग है, तो ही उसको राजयोगी कहेंगे अन्यथा उसको योगी ही कहेंगे, लेकिन राजयोगी नहीं कहेंगे। अब तो यह चैक करो कि क्या मैं सभी टाइटल धारण करने वाला योगी बना हूँ? कोई के आठ-दस, तो कोई के एक-दो। जैसे डाक्टर, वकील और इन्जीनियर, मिलिट्री में यह सब होंगे, वहाँ कर्नल भी होगा लेकिन उसकी लिस्ट तो अलग-अलग होगी। जैसे बनारस में भी यूनीवार्सिटी द्वारा टाइटल मिलता है कोई को एक-दो या छ: और कोई को आठ-दस, वैसे ही यहाँ भी टाइटल लेते हैं।

सिर्फ इसमें ही खुश नहीं होना है कि मैं योगी हूँ। जो महिमा, योग की गाई जाती है, अगर इन सबको अपने जीवन में धारण किया है, तो वह जितना ही यहाँ गायन होगा तो वह उतना ही वहाँ पूज्यनीय होगा। जैसे लौकिक रीति में भी बच्चा बाप की पूजा नहीं करता, लेकिन बाप को पूजनीय तो कहता है ना! इसी प्रकार जो सतयुग में प्रजा होगी, वह पूजा तो नहीं करेगी, लेकिन पूजनीय तो कहेगी अर्थात् रिगार्ड तो देगी। अब लिस्ट निकालो कि आपने अपने में कितने टाइटल धारण किये हैं और फिर चैक करो कि आपमें किसमें कमी है। टाइटल भी तब मिलता है, जब कि उसमें पास होते हैं।

 तो जब आपको भी अपनी सहजयोगी की स्थिति दिखाई दे और सभी यह महसूस करें कि आपका सहजयोग है, तब ही पास कहेंगे। ऐसे ही ज्ञानयोग में भी जो ज्ञान की महिमा है या उसकी उपमायें हैं, क्या वह सभी मैंने अपने में धारण की हैं? तो फिर आप स्वयं ही अपने नम्बर को जान सकते हो। जैसे कोई कहे कि पढ़ाई पॉवरफुल है, तो यह ज्ञान की महिमा हुई ना, न कि आपकी। तो अब देखो कि ज्ञान के जितने भी नाम हैं, क्या वह सब मैंने धारण किये हैं? अगर सब टाइटल ज्ञान और योग के धारण नहीं किये हैं, तो विश्व महाराजन् व विश्व-महारानी बन नहीं सकेंगे।

चलो, पास विद ऑनर नहीं, परन्तु पास तो होना है, फिर पास होने के लिए भी तो 75% मार्क्स चाहिए। अर्थात् यह सब धारणायें व योग्यतायें सबको अपने में दिखाई दें। सारे दिन के चार्ट में जैसे चौबीस घण्टे होते हैं, तो उसमें भी आठ घण्टे आराम के, फिर उसमें बचे सोलह घण्टे, तो सोलह का पौना बारह घण्टे, लेकिन जिनका बहुत बुद्धि का काम होता है, तो तीन घण्टे उनको छुट्टी देते हैं। और बाप होने के नाते एक घण्टा वैसे ही छोड़ते हैं। तो इस प्रकार आठ घण्टे बचे।

तो सहजयोगी, राजयोगी आदि जो भी ज्ञान और योग के टाइटल हैं, वह आप में आठ घण्टे तो पूर्ण रूप में होने ही चाहिए जिससे कि अन्य आत्मायें भी यह महसूस करें व सार्टिफिकेट प्रदान करें कि हाँ यह सब लक्षण इसमें हैं, तब ही इसमें 75% मार्क्स मिल सकेंगे। जो महारथी हैं अर्थात् ‘पास विद ऑनर’ होने वाले हैं, तो उनकी नींद का टाइम भी योग-युक्त स्थिति में गिना जाता है। उनकी स्टेज ऐसी होगी, जैसे कि पार्ट समाप्त कर वह स्वयं परमधाम में हैं और उनको योग की ही महसूसता होगी। जैसे गायन् है ना कि ब्रह्मा से ब्राह्मण बने। यहाँ तो ब्राह्मण से देवता बनते हैं।

लेकिन यह ब्रह्मा से ब्राह्मण अर्थात् रात को सोते समय बस यही संकल्प होगा, कि अब मैं अपना पार्ट पूरा कर कर्मइन्द्रियों से अलग होकर जाता हूँ अपने पारब्रह्म में और जब अमृत वेले उठेंगे, तो महसूस करेंगे कि मैंने यह आधार लिया है, पार्ट बजाने के लिए, तो गोया ब्रह्म से ब्राह्मण बनकर आये हैं। यहाँ से तो जाकर वे सीधे देवता बनेंगे। लेकिन यह इस समय के ही अष्ट रत्नों का गायन है। जैसे साकार में बाप और माँ सरस्वती को देखा-उन्हें फर्स्ट, सेकेण्ड नम्बर किस आधार पर मिला? उनकी ज्यादा समय की कमाई तो नींद की ही जमा हुई ना?

भले वे सोते भी थे, लेकिन ऐसा अनुभव करते थे कि नींद में नहीं हैं बल्कि हम तो जाग रहे हैं और फिर उनकी थकावट भी दूर हो जाती थी क्योंकि जब आत्मा कमाई में जागृत होती है, तो उसे थकावट भी नहीं होती। तो जैसे मां-बाप ने नींद को योग में बदला तो आप भी फर्स्ट ग्रेड के महारथियों को ऐसा ही फॉलो करना है। अब ऐसा अनुभव तो करते हो कि नींद कम होती जाती है, लेकिन ऐसी अवस्था बनानी है। नींद को योग में बदलो और फॉलो फादर करो। सारा दिन तो वे आपके समान ही साधारण थे ना? यह है फर्स्ट ग्रेड की निशानी-अष्ट रत्नों में आने वालों की। दूसरे हैं सौ वाले और फिर तीसरे हैं 16108 में आने वाले। लेकिन यहाँ महारथी तो सभी हैं, घोड़े सवार कोई नहीं है। लेकिन फर्स्ट, सेकेण्ड और थर्ड नम्बर होते हैं।

इसी प्रकार, जैसे किसी ने कर्मेन्द्रियों को ऑर्डर दिया और उसने वैसा ही किया, तो मानो कि वह कर्मयोगी है लेकिन जो सेकेण्ड ग्रेड वाले होंगे, तो उन्हें इसमें कभी-कभी  सफलता वा कर्मयोगी की महसूसता आयेगी और कभी-कभी नहीं और बाकी थर्ड ग्रेड वाले को तो तुम जान ही सकते हो। तो जब आपने फर्स्ट ग्रेड का बनना है, तो पहले लिस्ट निकालो कि ज्ञानयोग के कितने टाइटल्स हैं और आपने उनमें से कितने धारण किये हैं? यह क्लास कराना। ब्रह्माकुमार व ब्रह्माकुमारी का टाइटल तो सबको मिल गया पर इसमें ही खुश न होना है, बल्कि सब टाइटल्स को पूरापूरा धारण करना है। अच्छा!

मुरली पढ़ने के बाद परम शिक्षक सद्गुरु शिवबाबा से बताई गई विधि मनन चिंतन है।

मनन चिंतन करने की विधि, शिवबाबा चार मुरलीयों में बतायें हैं।

01-02-1979

23-12-1987

10-01-1988

07-04-1981

मनन शक्ति ही दिव्य बुद्धि की खुरक है।

हर वाक्य का रहस्य क्या है?, हर वाक्य को किस समय में?, किस विधि के द्वारा कार्य में प्रयोग करना है?, और हर वाक्य को दूसरे आत्माओं के प्रति सेवा में किस विधि से कार्य में लाना है?, ऐसे चार प्रकार से हर वाक्य को मनन करना है।

ज्ञान के मनन चिंतन के द्वारा समर्थ संकल्प, समर्थ स्थिति और शक्तिशाली स्मृति में रह सकते हैं।

ज्ञान की स्मृति (मनन चिंतन) द्वारा हमको ज्ञान दाता शिवबाबा की स्मृति स्वतः रहती है।

मनन चिन्तन करने के लिए उपयोगी संकल्प के लिए "समर्थ संकल्पों का खजाना" उपर के शिर्षकों में देखा जा सकता है।

मनन चिंतन मुरलीयों के लिए इस लिंक को स्पर्श करें।

जिम्मेवारीआत्मा भव!