रिवाइज कोर्स मुरली 24-01-1976  

निराकार ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप परमपिता शिवपरमात्मा इस धरती पर अवतरित होकर ज्ञान और योग से धर्म की स्थापन कर रहे हैं।

परम शिक्षक शिवपरमात्मा के द्वारा बताई गई इस ज्ञान मुरली को आत्मिक स्थिति में पढ़ना चाहिए।

आत्मिक स्थिति में आने के लिए किये जाने वाले संकल्प :

1. मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ, शिवबाबा मेरे परमपिता हैं।

2. मैं ईश्वरीय विद्यार्थि हूँ, बाबा मेरे टीचर हैं।

3. बाबा मेरे सद्गुरु हैं, मैं मास्टर सद्गुरु हूँ।

4. शिव परमात्मा मेरे जीवन साथी हैं, मैं शिव परमात्मा की जीवनसाथी हूँ।

5. सर्व संबंधों को बाबा से जोड़कर उस संबंध के कर्त्तव्य को ब्राह्मण जीवन में आचरण में लाने से आत्मिक स्थिति सहज हो जाती है।

आत्मिक स्थिति में, हर एक मुरली में, "बाबा मुरली मुझ से ही कह रहे हैं", ऐसे भाव से पढ़ना चाहिए।

पुरूषार्थ को तीव्र करने की युक्ति- अब नहीं तो कभी नहीं

रूहानी सेवाधारी टीचर्स से मधुर मुलाकात करते हुए अव्यक्त बाप-दादा ने ये मधुर महावाक्य उच्चारे:-

टीचर्स जैसे विशेष सेवार्थ निमित्त बनी हुई विशेष आत्मायें हैं, वैसा पुरूषार्थ भी चलता है या जैसे स्टूडेण्ट्स का चलता है, वैसे ही चलता है? पार्ट के अनुसार विशेष पुरूषार्थ कौनसा चलता है? सम्पूर्ण बनना है, सतोप्रधान बनना है - यह तो सभी का लक्ष्य है, यह तो इन-जनरल हो गया। लेकिन टीचर्स का विशेष पुरूषार्थ कौनसा चलता है? आजकल जो विशेष पुरूषार्थ करना है व होना चाहिये, वह यही है कि हर संकल्प पॉवरफुल हो- साधारण न हो, समर्थ हो व्यर्थ न हो। टीचर का अर्थ क्या है? सर्विसएबल, एक सेकेण्ड भी सर्विस के बिना न हो। मुरली पढ़ना, और चेकिंग करना - यह तो मोटी बात है!

जैसे समय समीप आ रहा है, तो निमित्त बनी हुई विशेष आत्माओं को पुरूषार्थ यह करना है कि समय से तेज दौड़ लगायें। ऐसे नहीं कहना है कि इतना समय पड़ा है, कमी दूर हो ही जाएगी। नहीं। यह बुद्धि में रखना है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। हर संकल्प, हर सेकेण्ड के लिए यह स्लोगन कि अब नहीं तो कभी नहीं। जब ऐसे अभी के संस्कार भरेंगे तो ऐसी अभी कहने वाली आत्मायें सतयुग के आदि में आयेंगी। कभी कहने वाले मध्य में आयेंगे। कभी कहने वाले समय का इन्तज़ार करते हैं। तो पद में भी इन्तज़ार करेंगे। तो हर सेकेण्ड, हर संकल्प में यह स्लोगन याद रहे। अगर यह पाठ पक्का नहीं होगा तो सदैव कमज़ोरी के संस्कार रहेंगे।

महावीर के संस्कार हैं - ‘अब नहीं तो कभी नहीं!’ हमारे से ये आगे हैं, यह करेंगे तो हम करेंगे - यह अलबेलेपन के संस्कार हैं। जो संकल्प आया वह अब करना ही है। कल नहीं आज, आज नहीं अब, अर्थात् अभी करना है।सभी विशेष आत्मायें हो न? अपने को छोटा तो नहीं समझते हो? पुरूषार्थ में हर एक बड़ा है। कारोबार में छोटा-बड़ा होता है, पुरूषार्थ में छोटा-बड़ा नहीं होता। पुरूषार्थ में छोटा आगे जा सकता है। कारोबार में मर्यादा की बात है। पुरूषार्थ में मर्यादा की बात नहीं। ‘पुरूषार्थ में जो करेगा, सो पायेगा। अब ऐसे चेक करना है कि ऐसा पुरूषार्थ है या कि जैसे साधारण सबका चलता है, वैसे चलता है? टीचर्स सदा हर्षित हैं?

 टीचर्स को अनेकों की आशीर्वाद की लिफ्ट भी मिलती है और किसी को कमज़ोर बनाने के निमित्त बनती है, तो पाप भी चढ़ता है। जिस बोझ के कारण जो चाहते हैं वह कर नहीं पाते। बोझ वाला ऊपर उठ नहीं सकेगा। इसलिए चाहते हुए भी चेन्ज नहीं होते तो ज़रूर बोझ है। उस बोझ को भस्म करो - विशेष योग से, मर्यादाओं से और लगन से। नहीं तो बोझ में समय बीत जावेगा, आगे बढ़ न सकोगे। अमृतवेले उठ कर अपनी सीट को सेट करो। जैसी सीट है, उसी प्रमाण सेट हैं? - यह चेक करो। अपने पोज़ (Pose) को ठीक करो। अगर पोज़ ठीक न भी होगा तो चेक करने से ठीक हो जावेगा। अच्छा!

मुरली पढ़ने के बाद परम शिक्षक सद्गुरु शिवबाबा से बताई गई विधि मनन चिंतन है।

मनन चिंतन करने की विधि, शिवबाबा चार मुरलीयों में बतायें हैं।

01-02-1979

23-12-1987

10-01-1988

07-04-1981

मनन शक्ति ही दिव्य बुद्धि की खुरक है।

हर वाक्य का रहस्य क्या है?, हर वाक्य को किस समय में?, किस विधि के द्वारा कार्य में प्रयोग करना है?, और हर वाक्य को दूसरे आत्माओं के प्रति सेवा में किस विधि से कार्य में लाना है?, ऐसे चार प्रकार से हर वाक्य को मनन करना है।

ज्ञान के मनन चिंतन के द्वारा समर्थ संकल्प, समर्थ स्थिति और शक्तिशाली स्मृति में रह सकते हैं।

ज्ञान की स्मृति (मनन चिंतन) द्वारा हमको ज्ञान दाता शिवबाबा की स्मृति स्वतः रहती है।

मनन चिन्तन करने के लिए उपयोगी संकल्प के लिए "समर्थ संकल्पों का खजाना" उपर के शिर्षकों में देखा जा सकता है।

मनन चिंतन मुरलीयों के लिए इस लिंक को स्पर्श करें।

अनुभवी मूर्त भव!