रिवाइज कोर्स मुरली 02-01-1978 |
निराकार ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप परमपिता शिवपरमात्मा इस धरती पर अवतरित होकर ज्ञान और योग से धर्म की स्थापन कर रहे हैं।
परम शिक्षक शिवपरमात्मा के द्वारा बताई गई इस ज्ञान मुरली को आत्मिक स्थिति में पढ़ना चाहिए।
आत्मिक स्थिति में आने के लिए किये जाने वाले संकल्प :
1. मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ, शिवबाबा मेरे परमपिता हैं।
2. मैं ईश्वरीय विद्यार्थि हूँ, बाबा मेरे टीचर हैं।
3. बाबा मेरे सद्गुरु हैं, मैं मास्टर सद्गुरु हूँ।
4. शिव परमात्मा मेरे जीवन साथी हैं, मैं शिव परमात्मा की जीवनसाथी हूँ।
5. सर्व संबंधों को बाबा से जोड़कर उस संबंध के कर्त्तव्य को ब्राह्मण जीवन में आचरण में लाने से आत्मिक स्थिति सहज हो जाती है।
आत्मिक स्थिति में, हर एक मुरली में, "बाबा मुरली मुझ से ही कह रहे हैं", ऐसे भाव से पढ़ना चाहिए।
ज्ञान चन्द्रमा और ज्ञान सितारों की रिमझिम
बापदादा सभी लवली और लकी बच्चों को देखते हुए हर्षित हो रहे हैं। हरेक के मस्तक पर तकदीर का सितारा चमकता हुआ देख रहे हैं। साकारी सृष्टि की आत्मायें आकाश की तरफ देखती हैं और आकाश से भी परे रहने वाला बाप साकारी सृष्टि में धरती के सितारे देखने आये हैं। जैसे चन्द्रमा के साथ सितारों की रिमझिम अति सुन्दर लगती है वैसे ही ब्रह्मा चन्द्रमा, बच्चे अर्थात् सितारों से ही सजते हैं। माँ का स्नेह बच्चों से ज्यादा होता है या बच्चों का माँ से ज्यादा होता है? बच्चे खेल में बिज़ी होते हैं तो माँ को भूल जाते हैं। माता की ममता बच्चों को याद दिलाती है। ऐसे भी अगर स्नेह नहीं होता तो बच्चों को प्राप्ति भी नहीं होती।
आज अमृतवेले विशेष इस समय के मधुबन की संगठित आत्मायें बाप की याद के साथ-साथ ब्रह्मा माँ की याद में ज्यादा थीं। आज वतन में भी बाप सूर्य गुप्त थे लेकिन चन्द्रमा अर्थात् ब्रह्मा, बड़ी माँ ब्राह्मण बच्चों या सितारों के साथ मिलन मनाने में लवलीन थे। आज वतन में क्या दृश्य था? मात-पिता और बच्चों की रुह-रुहान सदा चलती है लेकिन आज थी माता-पिता की। क्या रुह-रुहान होगी जानते हो? आज अमृतवेले ब्रह्मा ब्राह्मणों के स्नेह में विशेष थे क्योंकि मधुबन जो ब्रह्मा की साकार रुप में कर्म-भूमि, सेवा-भूमि या माँ और बाप दोनों रुप से साकार रुप में बच्चों की मिलन-भूमि है, ऐसे स्वयं द्वारा तन और मन द्वारा सजाई हुई ऐसी भूमि पर रिमझिम देख आज ब्रह्मा बाप या माँ को साकार रुप में साकार सृष्टि की विशेष याद आई।
ब्रह्मा बोले, “चन्द्रमा का सितारों से एक-समान रुप के मिलन में अब तक कितना समय है?'' अर्थात् व्यक्त और अव्यक्त रुप का मिलन कब तक? उत्तर क्या मिला होगा? बाप बोले, “जब माँ कहेगी कि सब एवररेडी हैं।'' इसलिए ब्रह्मा माँ परिक्रमा लगाने निकली। चारों ओर का चक्कर लगाते हर ब्राह्मण की रुहानियत देखते रहे। चक्कर लगाने के बाद वतन में जब रुह-रुहान हुई तो ब्रह्मा बोले - “मेरे बच्चे लक्ष्य में नम्बर वन हैं सबके अन्दर समय का इन्तजार है, समय पर तैयार हो ही जायेंगे।'' बाप बाले - “राजधानी तैयार हो गई है?'' ब्रह्मा आज ब्राह्मण बच्चों का तरफ ले रहे थे। ब्रह्मा बोले 16108 की माला तो तैयार हुई ही पड़ी है।
ब्राह्मणों की संख्या कितनी बताते हो? क्या 50 हजार से 16108 नहीं निकलेंगे? मणके तैयार हैं लेकिन नम्बरवार पिरोने के लिए लास्ट सेकेण्ड भी अभी रहा हुआ है। मणके फिक्स हो गये हैं, जगह फिक्स नहीं हुई है। जगह में लास्ट से फास्ट हो सकते हैं। आज ब्रह्मा ने 16108 मणकों अर्थात् सभी सहयोगी आत्माओं के तकदीर की लकीर फाइनल कर दी। इस कारण भाग्य विधाता, भाग्य बाँटने वाला ब्रह्मा को ही कहते हैं और यादगार रुप में भी जन्मपत्री, जन्मदिवस पर या नाम संस्कार पर ब्राह्मण ही जन्म-पत्री बनाते हैं। तो ब्रह्मा माँ ने 16108 मणकों की निश्चित तकदीर सुनाई। आप सब तो उसमें हो ना!
आज विशेष ब्रह्मा द्वारा विदेशी या देशी दोनों तरफ के बच्चों की महिमा के गुणगान हो रहे थे। जैसे आदि में आये हुए बच्चों के भाग्य की महिमा है, वैसे ही अव्यक्त रुप में पालना लेने वाले नये बच्चों की भी इतनी महिमा है। जैसे आदि में कोई प्रैक्टिकल जीवन का प्रभाव नहीं था सिर्फ एक बाप का स्नेह ही प्रमाण था। भविष्य क्या होना है - यह कुछ स्पष्ट नहीं था, गुप्त था। लेकिन आत्मायें शमा पर पूरे पंतगे थीं। ऐसे ही नये बच्चों के आगे अनेक जीवन के प्रमाण हैं। आदि मध्य अन्त स्पष्ट हैं। 84 जन्मों की जन्म-पत्री स्पष्ट है। पुरुषार्थ और प्रारब्ध दोनों ही स्पष्ट हैं लेकिन बाप अव्यक्त हैं। बाप की पालना अव्यक्त रुप में होते हुए भी व्यक्त रुप का अनुभव कराती है।
अव्यक्त को व्यक्त अनुभव करना, समीप और साथ का अनुभव करना - यह कमाल नये बच्चों की है। जैसे आदि में बच्चों की कमाल है वैसे ही लास्ट सो फ़ास्ट जाने वालों की भी कमाल है। ऐसी कमाल के गुणगान कर रहे थे। सुना आज की रुह-रुहान। उल्हनों की मालायें भी खूब थी। जिन उल्हनों की मालायें, बह्मा को स्नेह रुप बना रहीं थी। सुनाया ना, कि आज ब्रह्मा विशेष बच्चों के स्नेह में समाये हुए थे। स्नेह की मूर्ति होते हुए भी ड्रामा की सीट पर सेट थे। इसलिए स्नेह को समा रहे थे। आप लोग भी सागर के बच्चे समाने वाले हो ना। दिखा भी सकते हो और समा भी सकते हो। मर्ज और इमर्ज करना अच्छी तरह से जानते हो ना क्योंकि हो ही हीरो एक्टर। जब चाहें, जैसे चाहें वैसा रुप धारण कर सकते हो अर्थात् पार्ट बजा सकते हो। अच्छा।
ऐसे सदा स्नेही, सर्व शक्तियों से सम्पन्न, सदा अति प्यारे और अति न्यारे, सदैव अपने तकदीर के चमकते हुए सितारे को देखने वाले, सर्वश्रेष्ठ तकदीरवान, वर्तमान और भविष्य तख्तनशीन, ऐसे पदमपति सेकेण्ड में स्वयं को या सर्व को परिवर्तन करने वाले विश्व-कल्याणकारी बच्चों को बाप-दादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दादियों से मुलाकात:- आज अमृतवेले ब्रह्मा ने जो विशेष आत्माओं की तकदीर की लकीर फाइनल की थी उसमें फाइनल कौन से रत्न होंगे? 8 रत्न फाइनल हुए होंगे? माँ बाप के पास तो निश्चित हैं ही। बाकी है स्टेज पर प्रसिद्ध करना। बाप के पास 108 ही निश्चित हैं, क्यों? बाप के पास भविष्य भी ऐसा ही क्लीयर है जैसे वर्तमान। अनन्य बच्चों के पास भी भविष्य ऐसा ही स्पष्ट होता जा रहा है क्योंकि बाप के साथ सर्व कार्य में समीप और सहयोगी हैं तो अष्ट रत्न चीफ जस्टिस हैं। जस्टिस की जजमेण्ट हाँ या ना की फाइनल होती है। बाप प्रेजीडेण्ट है लेकिन बच्चे चीफ जस्टिस हैं। जजमेण्ट बच्चों की है। चीफ जस्टिस की जजमेण्ट सदा यथार्थ होती है।
जस्टिस के ऊपर चीफ जस्टिस हाँ या ना कर सकते हैं लेकिन चीफ जस्टिस के जजमेण्ट की बहुत वैल्यु होती है। इसलिए जब तक भविष्य भी वर्तमान के समान स्पष्ट न हो तो जजमेण्ट यथार्थ कैसे दे सकेंगे? वर्तमान और भविष्य की समानता इसी को ही बाप की समानता कहा जाता है। ऐसी स्टेज (अवस्था) अनुभव में लाई है?
आज साकारी रूप में याद किया था या अव्यक्त रूप में? सितारों को देख चन्द्रमा याद आता है ना इसलिए आज ब्रह्मा ने भी याद किया। अच्छा।
गुजरात की पार्टी से मुलाकात:- गुजरात को विशेष लास्ट सो फास्ट जाने का वरदान मिला हुआ है। गुजरात वालों को यह नशा रहता है कि ड्रामा अनुसार हम आत्माओं को विशेष भाग्य प्राप्त है। जैसे स्थान के हिसाब से गुजरात मधुबन के भी समीप है ऐसे ही पुरुषार्थ में समीपता लाने का स्वत: वरदान भी ड्रामा अनुसार प्राप्त है क्योंकि जैसे स्थान के हिसाब से समीप हो वैसे ज्ञान की धारणा के हिसाब से धारणा योग्य धरती है। जैसे धरती अच्छी होती है तो फल जल्दी निकलता है। मेहनत कम और फल ज्यादा निकलता है। तो गुजरात को धरनी का और समीप होने का वरदान है। ऐसी वरदानी आत्मायें पुरुषार्थ में कितनी तेज होंगी?
धारणा की सब्जेक्ट में गुजरात देश के निवासियों को लिफ्ट है। कलियुगी दुनिया के हिसाब से अति तमोप्रधान के हिसाब से फिर भी अच्छी कहेंगे। इसलिए गुजरात को अपने दोनों वरदानों की लिफ्ट के आधार से फर्स्ट में पहुंचना चाहिए। वरदानों का लाभ लो तो हर मुश्किल बात सहज अनुभव करेंगे। देखने में अति मुश्किल होगी लेकिन अति सहज रीति से हल हो जायेगा। इसको कहा जाता है पहाड़ भी रूई समान बन जाता है। राई फिर भी सख्त होती है, रूई नर्म और हल्की होती है। तो ऐसे अनुभव करते हो? अच्छा।
मुरली पढ़ने के बाद परम शिक्षक सद्गुरु शिवबाबा से बताई गई विधि मनन चिंतन है।
मनन चिंतन करने की विधि, शिवबाबा चार मुरलीयों में बतायें हैं।
01-02-1979
23-12-1987
10-01-1988
07-04-1981
मनन शक्ति ही दिव्य बुद्धि की खुरक है।
हर वाक्य का रहस्य क्या है?, हर वाक्य को किस समय में?, किस विधि के द्वारा कार्य में प्रयोग करना है?, और हर वाक्य को दूसरे आत्माओं के प्रति सेवा में किस विधि से कार्य में लाना है?, ऐसे चार प्रकार से हर वाक्य को मनन करना है।
ज्ञान के मनन चिंतन के द्वारा समर्थ संकल्प, समर्थ स्थिति और शक्तिशाली स्मृति में रह सकते हैं।
ज्ञान की स्मृति (मनन चिंतन) द्वारा हमको ज्ञान दाता शिवबाबा की स्मृति स्वतः रहती है।
मनन चिन्तन करने के लिए उपयोगी संकल्प के लिए "समर्थ संकल्पों का खजाना" उपर के शिर्षकों में देखा जा सकता है।
मनन चिंतन मुरलीयों के लिए इस लिंक को स्पर्श करें।