रिवाइज कोर्स मुरली 14-01-1980 |
निराकार ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप परमपिता शिवपरमात्मा इस धरती पर अवतरित होकर ज्ञान और योग से धर्म की स्थापन कर रहे हैं।
परम शिक्षक शिवपरमात्मा के द्वारा बताई गई इस ज्ञान मुरली को आत्मिक स्थिति में पढ़ना चाहिए।
आत्मिक स्थिति में आने के लिए किये जाने वाले संकल्प :
1. मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ, शिवबाबा मेरे परमपिता हैं।
2. मैं ईश्वरीय विद्यार्थि हूँ, बाबा मेरे टीचर हैं।
3. बाबा मेरे सद्गुरु हैं, मैं मास्टर सद्गुरु हूँ।
4. शिव परमात्मा मेरे जीवन साथी हैं, मैं शिव परमात्मा की जीवनसाथी हूँ।
5. सर्व संबंधों को बाबा से जोड़कर उस संबंध के कर्त्तव्य को ब्राह्मण जीवन में आचरण में लाने से आत्मिक स्थिति सहज हो जाती है।
आत्मिक स्थिति में, हर एक मुरली में, "बाबा मुरली मुझ से ही कह रहे हैं", ऐसे भाव से पढ़ना चाहिए।
रूहानी सेनानियों से रूहानी कमाण्डर की मुलाकात
आज विशेष कौन-सा संगठन है? इस संगठन को, अपने डबल सेवाधारी बच्चों को, जो हरेक डबल सेवाधारी वा डबल नॉलेजफुल हैं, ऐसे ग्रुप को देख आज वतन में एक विशेष संवाद चला -
ब्रह्मा बाप बोले - ‘ये विशेष मेरी भुजायें हैं।' शिव बाप बोले - ‘यह मेरी रूद्र माला है'। रूद्र माला में विशेष मणके हैं। ऐसी चिटचैट चलते हुए शिवबाबा ने ब्रह्मा बाप से पूछा कि आपकी यह सब भुजायें राइट हैण्ड्स हैं या लेफट हैण्ड्स भी हैं। राइट हैण्ड अर्थात् सदा समान, स्वच्छ और सत्यवादी। तो सब राइट हैण्ड्स हैं? तो ब्रह्मा बाप मुस्कराये और मुस्कराते हुए बोले कि हरेक का पोतामेल तो आपके पास है ही। जब पोतामेल देखने की बात आई, हरेक बच्चे का पोतामेल सामने इमर्ज हुआ। कैसे इमर्ज हुआ? एक घड़ी के रूप में। जिसमें हरेक की चार सब्जेक्ट्स के चार भाग थे। जैसे यहाँ सृष्टि चक्र का चित्र बनाते हो।
हर भाग में अलग-अलग काँटे लगे हुए थे जो हरेक के चारों ही सब्जेक्ट्स की परसेन्टेज बता रहे थे। सबके पोतामेल स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। पोतामेल देखते हुए बापदादा आपस में बोले - समय की घड़ी और बच्चों के पुरूषार्थ की घड़ी दोनों को देखते हुए क्या दिखाई दिया? समय की घड़ी और बच्चों के पुरूषार्थ की घड़ी मैजारिटी की दो भाग अर्थात् दो सब्जेक्ट्स की रिजल्ट 75 परसेन्ट फिर भी ठीक थी। लेकिन दो सब्जेक्ट्स के परसेन्टेज की रिज़ल्ट बहुम कम थी। तो बापदादा बोले - इस रिज़ल्ट के प्रमाण एवररेडी ग्रुप कहेंगे?
जैसे विनाश का बटन दबाने की देरी है, सेकेण्ड की बाज़ी पर बात बनी हुई है, ऐसे स्थापना के निमित्त बने हुए बच्चे एक सेकेण्ड में तैयार हो जायें, ऐसा स्मृति का समर्थ बटन तैयार है? जो संकल्प किया और अशरीरी हुए। संकल्प किया और सर्व के विश्व-कल्याणकारी ऊंची स्टेज पर स्थित हो गए और उसी स्टेज पर स्थित हो, साक्षी दृष्टा हो विनाश लीला देख सकें। देह के सर्व आकर्षण अर्थात् सम्बन्ध, पदार्थ, संस्कार इन सबकी आकर्षण से परे, प्रकृति की हलचल की आकर्षण से परे, फरिश्ता बन ऊपर की स्टेज पर स्थित हो शान्ति और शक्ति की किरणें सर्व आत्माओं के प्रति दे सकें। ऐसे स्मृति का समर्थ बटन तैयार है? जब दोनों बटन तैयार हों तब तो समाप्ति हो।
इस ग्रुप को देखकर वतन में पोतामेल इमर्ज हुआ। जैसे बाहुबल वाली सेना में भी वैराइटी प्रकार के सैनिक होते हैं। कोई बॉर्डर पर जाने वाले, युद्ध के मैदान पर जाने वाले अर्थात् डायरेक्ट वार करने वाले और दूसरे उनकी पालना करने वाले पीछे होते हैं। डायरेक्टर तो बैकबोन होते हैं। ऐसे ही यह जो ग्रुप है वह मैदान पर सेवा करने वाला ग्रुप है। मैदान में आने वाली सेना के आधार पर ही विजय अथवा हार की बात होती है। अगर मैदान में आने वाले कमज़ोर, शस्त्रहीन, डरपोक होते हैं तो कभी भी डायरेक्टर की विजय नहीं हो सकती है। विश्व-कल्याण के मैदान पर यह सेवाधारी ग्रुप है। यह ग्रुप बहादुर है। सामना करने की शक्ति अर्थात् अनुभव कराने की शक्ति, सभी को श्रेष्ठ चरित्र द्वारा बापदादा का चित्र दिखाने की शक्ति - ऐसे शस्त्रधारी हैं?
क्या समझते हो - ऐसे शक्ति स्वरूप ग्रुप है? चारों ही सब्जेक्ट्स के चारों ही अलंकारधारी हो? दो भुजा वाले शक्ति स्वरूप हो या चार भुजा वाले हो? यह चार अलंकार चार सब्जेक्ट्स की निशानी हैं। तो सभी अलंकार धारण किए हैं? या किसी ने दो धारण किए हैं, किसी ने तीन किये हैं या एक धारण करते हैं तो दूसरा छूट जाता है? तो इस ग्रुप का महत्व समझा। सेवा के मैदान पर आने वाला ग्रुप है अर्थात् विजय के आधारमूर्त ग्रुप है। आधारमूर्त, मज़बूत हो ना? आधार हिलने वाले तो नहीं हैं ना। ज्ञान और सेवा इन दो सब्जेक्ट्स में 75 परसेन्ट देखी।
वैसे याद और धारणा इन दो सब्जेक्ट्स पर भी ज्यादा अटेन्शन दे चारों ही अलंकारधारी बनो, नहीं तो सृष्टि की आत्माओं को सम्पूर्ण साक्षात्कार करा नहीं सकेंगे। इसलिए इन दो अलंकारों को धारण करने के लिए विशेष क्या अटेन्शन रखेंगे? डबल सेवाधारी हो - लौकिक और ईश्वरीय। शरीर निर्वाह अर्थ और आत्म निर्वाह अर्थ डबल सेवा मिली हुई है। और दोनों ही सेवा बापदादा के डायरेक्शन प्रमाण मिली हुई हैं, लेकिन दोनों ही सेवाओं में समय का, शक्तियों का समान अटेन्शन देते हो? तराज़ू के दोनों तरफ समान रखते हो? काँटा ठीक रखते हो कि बिना काँटे के तराज़ू रखते हो? काँटा है श्रीमत। अगर श्रीमत का काँटा ठीक है तो दोनों साइड समान होंगी अर्थात् तराज़ू का बैलेन्स ठीक होगा।
अगर काँटा ही ठीक नहीं है तो बैलेन्स रह नहीं सकता। कोई-कोई बच्चे एक तरफ का वज़न ज्यादा रखते हैं। कैसे? लौकिक ज़िम्मेवारियाँ निभानी ही हैं, ऐसे समझते हैं और ईश्वरीय ज़िम्मेवारियाँ निभानी तो हैं, ऐसे कहते हैं। वह निभानी ही हैं और वो निभानी तो है। इसलिए एक तरफ का वज़न ज्यादा हो जाता है और रिज़ल्ट क्या होती है? बोझ उनको ही नीचे ले आता है। ऊपर नहीं उठ सकते। बोझ वाला साइड सदा नीचे धरती पर लग जाता है और हल्का ऊपर उठ जाता है। और समान वाला भी ऊंचा उठता, नीचे धरती पर नहीं लगेगा। धरती पर लगने के कारण धरती के आकर्षण वश हो जाते हैं। बोझ के कारण ईश्वरीय सेवा के मैदान पर हल्के होकर सदा सफलता मूर्त नहीं बन सकते।
कर्मबन्धन के, लोकलाज के बोझ नीचे ले आते हैं। जिस लोक को छोड़ चुके उस लोक की लाज रखते हैं और जिस संगमयुग वा संगम लोक के बन चुके, उस लोक की लाज रखना भूल जाते हैं। जो लोक भस्म होने वाला है उस लोक की लाज सदा स्मृति में रखते और जो लोक अविनाशी है और इसी लोक से भविष्य लोक बनना है, उस लोक की स्मृति दिलाते भी कभी-कभी स्मृति स्वरूप बनते हैं। गृहस्थ व्यवहार और ईश्वरीय व्यवहार दोनों में समानता रखना अर्थात् सदा दोनों में हल्के और सफल होना। वास्तव में गृहस्थ व्यवहार शब्द चेन्ज करो। गृहस्थ शब्द बोलते ही गृहस्थी बन जाते हो। इसलिए गृहस्थी नहीं हो ट्रस्टी हो। गृहस्थ व्यवहार नहीं, ट्रस्ट व्यवहार है।
गृहस्थी बनते हैं तो क्या करते हैं? गृहस्थियों का कौन-सा खेल है? गृहस्थी बनते हो तो बहाने बाज़ी बहुत करते हो। ऐसे और वैसे की भाषा बहुत बोलते हो। ऐसे है ना, वैसे है ना। बात को भी बढ़ाने लग जाते हैं। यह तो आप जानते हो करना ही पड़ेगा, यह तो ऐसे ही है, वैसे ही है - यह पाठ बाप को भी पढ़ाने लग जाते हो। ट्रस्टी बन जाओ तो बहाने बाज़ी खत्म हो चढ़ती कला की बाज़ी शुरू हो जायेगी। तो आज से अपने को गृहस्थ व्यवहार वाले नहीं समझना। ट्रस्ट व्यवहार है। जिम्मेवार और है, निमित्त आप हो। जब ऐसे संकल्प में परिवर्तन करेंगे तो बोल और कर्म में परिवर्तन हो ही जायेगा। तो यही ग्रुप एक-एक बहुत कमाल कर सकते हैं।
कर्मयोगी, सहजयोगी का हरेक सैम्पुल अनेक आत्माओं को श्रेष्ठ सौदा करने के निमित्त बना सकते हैं। और जो भी हद के गुरू होते हैं उनका एक शिष्य गद्दी पर बैठ अपने गुरू का नाम बाला करते हैं और यहाँ सतगुरू के इतने सब तख्त नशीन बच्चे हो - एक-एक बच्चा कितना श्रेष्ठ कार्य कर सकते हैं। बापदादा सभी बच्चों को ऐसे सर्विसएबुल, विश्व में नाम बाला करने वाले विश्व-कल्याणकारी बच्चा समझते हैं। जब एक दीपक दीप माला बना देता है तो आप एक-एक दीपक सारे विश्व में दीपावली कर देंगे। समझा, इस ग्रुप को क्या करना है! वैराइटी ग्रुप को वैराइटी वर्ग वाली आत्माओं के सेवाधारी बन सर्व की सद्गति वा श्रेष्ठ जीवन बनाने का आधारमूर्त बनना है। जैसे डबल विदेशी हैं वैसे यह डबल नालेजफुल हैं, डबल सर्विसएबुल हैं। रिज़ल्ट भी डबल निकालनी है।
ऐसे सदा सर्व बन्धनमुक्त, सदा जीवनमुक्त, विश्व शो केस के विशेष शो पीस, विश्व-परिवर्तन करने के आधार मूर्त, सदा श्रीमत के आधार पर स्व उद्धार और विश्व उद्धार करने वाले, ऐसे सदा विश्व सेवाधारियों को, बेहद के सेवाधारियों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
डॉक्टर्स के प्रति अव्यक्त बापदादा के मधुर महावाक्य:-
डबल डॉक्टर्स का ग्रुप है ना। जैसे सभी डॉक्टर्स अपने हद की डॉक्टरी के स्पेशालिस्ट होते हैं वैसे रूहानी डॉक्टरी में विशेष किस सेवा के निमित्त बने हुए हो? जैसे हद की डॉक्टरी में कोई आंखों का, कोई विशेष गले का, कोई सर्जन, कोई सिर्फ दवाईयाँ देने वाला होता है। तो इस रूहानी डॉक्टरी में क्या विशेषतायें हैं? एक सेकेण्ड में किसी के पुराने संस्कार रूपी बीमारी को नयनों की दृष्टि द्वारा समाप्त कर दें अर्थात् उस समय उस बीमारी से उसको भुला दें, ऐसी विशेषता वाले डॉक्टर्स हो? जैसे वह आंखे ठीक कर देते हो, ऐसे अपनी दृष्टि द्वारा किसी के पुराने संस्कार को पहले दबा दें फिर समाप्त करा दें, उस समय शान्त कर दें, ऐसी विशेषता वाले डॉक्टर्स हो, यह हुआ आंखों का डॉक्टर जो दृष्टि से परिवर्तन कर दें।
जैसे डॉक्टर गोली देकर थोड़े समय के लिए दर्द को दबा देते हैं ऐसे आंखों के डॉक्टर हो जो दृष्टि से उसको सन्तुष्ट कर दो। हद के नहीं रूहानी। रूहानी आंखों के डॉक्टर अर्थात् रूहानी दृष्टि से शफा देने वाले।
2. ऑपरेशन वाले डॉक्टर, जैसे वह औज़ारों से ऑपरेशन करते हो वैसे अपने में जो शक्तियाँ हैं, यह शक्तियाँ ही यत्र हो जायें, जिन यत्रों द्वारा उनकी कमज़ोरियाँ समाप्त हो जायेंगी। जैसे अपने ही थियेटर के यत्रों द्वारा ऑपरेशन करते हो, पेशेन्ट के यत्र तो नहीं यूज़ करते हो ना, ऐसे अपनी शक्तियों के यत्र द्वारा बीमारी को ठीक कर दो, कामी को निष्कामी और क्रोधी को निक्रोधी बना दो। इसके लिए सहनशक्ति का यत्र यूज़ करना पड़े। तो ऐसे ऑपरेशन वाले डॉक्टर हो? जैसे उसमें आंख, नाक सबके अलग-अलग स्पेशालिस्ट होते हैं ऐसे यहाँ भी अलग-अलग विशेषतायें हैं। यहाँ भी जितनी कोई डिग्री लेना चाहे तो ले सकता है। जो सर्व विशेषताओं में ऑलराउण्डर हो जाते हैं वे नामीग्रामी हो जाते हैं।
डॉक्टर्स तो बहुत सेवा कर सकते हैं - क्यों? क्योंकि पेशेन्ट उस समय बिल्कुल भिखारी के रूप में आते हैं। अगर उस समय डॉक्टर उन्हें झूठी दवाई भी दे देते, पानी भी दे देते तो भी भावना के कारण वह ठीक हो जाते हैं। उन्हें खुशी की खुराक मिल जाती, जिससे वह ठीक हो जाते। दवाई से ठीक नहीं होते, खुशी से ठीक हो जाते। तो डॉक्टर्स के पास भिखारी के रूप में आते हैं, दो घड़ी के लिए भी दर्द मिटाओ, उन्हें आप उस समय क्या भी सुनाओ तो सुनने के लिए तैयार हो जाते हैं। तो जैसे इन्जेक्शन लगाकर सेकेण्ड में उसके दर्द की सुधबुध भुला देते हो, ऐसे ज्ञान का इंजेक्शन भी लगाओ जो पुराने संस्कारों की सुधबुध भूल जाऍ। ऐसा इन्जेक्शन आप सबके पास है ना?
जो पहले अपने को इन्जेक्शन लगाकर संस्कारों को भुला सकते हैं, तब फिर अनुभव के आधार से औरों को भी लगा सकेंगे। तो डबल डॉक्टर्स की कोई तो विशेषता होनी चाहिए ना। अभी कोई भी आयेगा तो आपके पास भेजेंगे, ऐसे नहीं केस वापस चला जाए। बहुत अच्छा चान्स है सेवा में आगे बढ़ने का। डॉक्टर्स तो एक दिन में काफी प्रजा बना सकते हैं, रोज प्रजा बनी-बनाई आपके पास आती है, ढूँढने नहीं जाना पड़ता है। वैसे मेले प्रदर्शनी में कितना खर्चा करके बुलाते हैं, आपको तो बहुत सहज है। अगर सम्बन्ध में लाया तो बच्चे भी बन सकते हैं। कोई-कोई अच्छा-अच्छा कहकर चले भी जायेंगे लेकिन वह अन्त में हलचल के समय इच्छुक होकर महसूसता शक्ति के साथ-साथ आयेंगे।
इसलिए सेवा करते रहना चाहिए। फिर भी आपको इष्ट मानेंगे जरूर। और कुछ नहीं तो कम-से-कम आपके भक्त तो बन जायेंगे। अगर अन्त में यह भी कहा कि इन्होंने सन्देश अच्छा दिया, सन्देशी थे, पैगम्बर थे, यह भी सोचा तो भक्त बन जायेंगे। लास्ट स्टेज भक्त है, वह भी तो चाहिए। अभी जो आते हैं वह 7 दिन के कोर्स से, अपनी हिम्मत से चलने वाले कम हैं, लास्ट पूर है ना। लास्ट पूर में ताकत नहीं होती। इसलिए अभी की आत्माओं को स्वयं की शक्तियों के सहयोग द्वारा आगे बढ़ाने का समय है। आपकी भेंट में अभी की आत्मायें टू लेट हो गई हैं, क्योंकि लास्ट पूर हो गया इसलिए स्वयं का उल्लास देकर उनको चलाना है। आपको महादानी, वरदानी बनना पड़े।
वह अपने आधार पर नहीं चल सकते। तो ऐसा पावरफुल यंत्र निकालो जो एक सेकेण्ड में अनुभव कराने वाला हो। अब अपने हमजिन्स की संख्या को बढ़ाओ। अभी ऐसा इन्जेकशन तैयार करो जो लगाओ और सुधबुध भूल जाऍ। उस दुनिया से बेहोश हो इस दुनिया में आ जाऍ। ऐसा इन्जेक्शन तैयार करना पड़े। अब देखेंगे इस वर्ष में अपनी संख्या कितनी बढ़ाते हो। कम-से-कम आपके हमजिन्स उल्हना तो न दें कि हमको बताया ही नहीं, अगर हम नहीं जागते थे तो जगाना तो फ़र्ज था, यह भी उल्हना देंगे। एक बार निमंत्रण दे दिया, पर्चा भेज दिया तो कैसे जागेंगे। जो कुम्भकरण की नींद में सोया हुआ हो उसे एक बार आवाज़ दे दो - ऐ, जाग जाओ, तो कैसे जागेगा। इसलिए बार-बार जगाना पड़े।
इंजीनियर्स से:- इंजीनियर अर्थात् प्लैनिंग बुद्धि। इंजीनियर सदा प्लैन सेट कर कार्य को आगे बढ़ाते हैं। तो इंजीनियर ग्रुप अर्थात् रुहानी प्लैनिंग बुद्धि ग्रुप, ऐसे हो? इस रुहानी सेवा में भी प्लैनिंग बुद्धि बन सेवा का प्लैन बनाते हो? नया प्लैन बनाते हो या बने हुए प्लैन को प्रैक्टिकल में लाते हो? प्लैनिंग बुद्धि तो प्लैन बनाने के बिना रह न सकें। जिसका जो काम होता है वह न चाहते भी उसी कार्य में सदा बिज़ी रहते हैं। तो सदा जैसे उस डिपार्टमेन्ट का अटेन्शन रहता है ना - क्या करें, कैसे करें, कैसे सफल बनायें, किस विधि से वृद्धि करें, यही इंजीनियर्स का काम है ना। तो रुहानी इंजीनियर्स को ईश्वरीय सेवा की विधिपूर्वक वृद्धि कैसे हो - उसका प्लैन बनाना पड़े।
अगर सभी अपना नया प्लैन तैयार करें तो इतने सारे प्लैन से नई दुनिया तो जल्दी ही आ जायेगी। अभी ऐसा प्लैन बनाओ जो कम खर्च और अधिक सफलता वाला हो। जैसे सेक्रीन की एक भी बूंद बहुत काम करती है। ऐसे ही प्लैन पॉवरफुल हो लेकिन एकॉनामी वाला हो। आजकल के समय अनुसार एकॉनामी भी चाहिए और पॉवरफुल भी चाहिए। रुहानी गवर्न्मेन्ट के इंजीनियर्स ऐसा प्लैन तैयार करो। जैसे आजकल एक इण्डस्ट्री के द्वारा अनेकों को काम देने का प्लैन सोचते हैं तो यहाँ भी प्लैन एकॉनामी का हो, सन्देश अनेकों को मिल जाए। जैसे वहाँ सोचते हैं कि अनेकों को रोजी मिल जाए तो यहाँ भी अनेकों को सन्देश मिल जाए।
यहाँ इंजीनियर्स बहुत चाहिए, क्योंकि सतयुग में इंजीनियर्स कम समय में और सुन्दर चीजें तैयार करेंगे तो यहाँ से ही संस्कार चाहिए ना। तब तो ऐसा प्लैन बनायेंगे। आप राजा बनेंगे तो भी बनवायेंगे तो ना, आइडिया देंगे। तो नई दुनिया का प्लैन बनाने के लिए और सेवा की सफलता पाने के लिए भी इंजीनियर्स चाहिए। तो आपका कितना महत्व है। ऐसा महत्व समझते हुए चलते हो? हरेक को समझना चाहिए मुझे सफलता का सबूत देना है। हरेक नया प्लैन बनाकर पहले अपने-अपने जोन में प्रैक्टिकल में लाओ फिर सारा विश्व आपको कॉपी करे। प्लैन पास न होने का कारण होता है कि एकॉनामी नहीं होती, अगर एकॉनामी और सफलता का प्लैन हो तो सभी पास करेंगे।
तो 60 इंजीनियर्स अगर 60 प्लैन निकाले तो 80 में ही समाप्ति हो जाए। समाप्ति भी एक सेकेण्ड में नहीं होगी, धीरे-धीरे परिवर्तन होगा। लेकिन शुरु हो जाये और सबके दिल से यह आवाज़ निकले कि अब नई दुनिया आने वाली है। जैसे साइन्स वालों ने चन्द्रमा पर जाकर थोड़ी झलक दिखाई तो सबने प्लॉट खरीदने की तैयारी शुरु कर दी, तो कम से कम साइलेन्स की शक्ति वाले नई दुनिया में प्लाट खरीदने की तैयारी तो करा दो। बुकिंग तो करा लें। जैसे साइन्स की कोई भी इन्वेन्शन पहले प्रयोगशाला में लाकर अनाउन्स करते हैं, ऐसे आप लोग भी पहले अपनी एरिया की प्रयोगशाला में प्लैन का प्रयोग करो। फिर सब मानेंगे। प्लैन की प्रैक्टिकल सफलता निकले।
जो प्रदर्शनी वा मेला देख चुके उनके लिए अब नया प्लैन चाहिए। नई आकर्षण चाहिए। तो प्लैनिंग बुद्धि प्लैन निकालो। ड्रामा अनुसार जो विशेषता मिली हुई है, उस विशेषता को कार्य में लगाना अर्थात् विशेष लॉटरी लेना। नये-नये साधन बनाने का प्लैन निकालो, कॉपी में नहीं, प्रैक्टिकल में। वहाँ के तो कागज़ पर ही रह जाते हैं लेकिन यह प्रैक्टिकल के प्लैन हों। अच्छा - ओम् शान्ति।
मुरली पढ़ने के बाद परम शिक्षक सद्गुरु शिवबाबा से बताई गई विधि मनन चिंतन है।
मनन चिंतन करने की विधि, शिवबाबा चार मुरलीयों में बतायें हैं।
01-02-1979
23-12-1987
10-01-1988
07-04-1981
मनन शक्ति ही दिव्य बुद्धि की खुरक है।
हर वाक्य का रहस्य क्या है?, हर वाक्य को किस समय में?, किस विधि के द्वारा कार्य में प्रयोग करना है?, और हर वाक्य को दूसरे आत्माओं के प्रति सेवा में किस विधि से कार्य में लाना है?, ऐसे चार प्रकार से हर वाक्य को मनन करना है।
ज्ञान के मनन चिंतन के द्वारा समर्थ संकल्प, समर्थ स्थिति और शक्तिशाली स्मृति में रह सकते हैं।
ज्ञान की स्मृति (मनन चिंतन) द्वारा हमको ज्ञान दाता शिवबाबा की स्मृति स्वतः रहती है।
मनन चिन्तन करने के लिए उपयोगी संकल्प के लिए "समर्थ संकल्पों का खजाना" उपर के शिर्षकों में देखा जा सकता है।
मनन चिंतन मुरलीयों के लिए इस लिंक को स्पर्श करें।