रिवाइज कोर्स मुरली 28-01-1980
निराकार ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप परमपिता शिवपरमात्मा इस धरती पर अवतरित होकर ज्ञान और योग से धर्म की स्थापन कर रहे हैं।
परम शिक्षक शिवपरमात्मा के द्वारा बताई गई इस ज्ञान मुरली को आत्मिक स्थिति में पढ़ना चाहिए।
आत्मिक स्थिति में आने के लिए किये जाने वाले संकल्प :
1. मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ, शिवबाबा मेरे परमपिता हैं।
2. मैं ईश्वरीय विद्यार्थि हूँ, बाबा मेरे टीचर हैं।
3. बाबा मेरे सद्गुरु हैं, मैं मास्टर सद्गुरु हूँ।
4. शिव परमात्मा मेरे जीवन साथी हैं, मैं शिव परमात्मा की जीवनसाथी हूँ।
5. सर्व संबंधों को बाबा से जोड़कर उस संबंध के कर्त्तव्य को ब्राह्मण जीवन में आचरण में लाने से आत्मिक स्थिति सहज हो जाती है।
आत्मिक स्थिति में, हर एक मुरली में, "बाबा मुरली मुझ से ही कह रहे हैं", ऐसे भाव से पढ़ना चाहिए।
"सम्पूर्ण ब्रह्मा और सम्पूर्ण ब्राह्मणों के सम्पूर्ण स्वरूप के अन्तर का कारण और निवारण"
आज हरेक बच्चे का डबल स्वरूप देख रहे हैं। कौन-सा डबल रूप? एक वर्तमान पुरुषार्थी स्वरूप, दूसरा वर्तमान जन्म का अन्तिम सम्पूर्ण फरिश्ता स्वरूप। इस समय `हम सो, सो हम' के मन्त्र में पहले हम सो फरिश्ता स्वरूप हैं फिर भविष्य में हम सो देवता रूप है। आज वतन में, सभी बच्चों के नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार, जो अन्तिम फरिश्ता स्वरूप बनना है, उस रूप को इमर्ज किया। जैसा साकार ब्रह्मा और सम्पूर्ण ब्रह्मा। दोनों के अन्तर को देखते और अनुभव करते थे कि पुरुषार्थी और सम्पूर्ण में क्या अन्तर है। ऐसे आज बच्चों के अन्तर को देख रहे थे। दृश्य बहुत अच्छा था। नीचे तपस्वी पुरुषार्थी रूप और ऊपर खड़ा हुआ फरिश्ता रूप।
अपना-अपना रूप इमर्ज कर सकते हो? अपना सम्पूर्ण रूप दिखाई देता है? सम्पूर्ण ब्रह्मा और सम्पूर्ण ब्राह्मण। हरेक समझते हैं कि ब्रह्मा और हमारे सम्पूर्ण रूप में कितना अन्तर होगा। नम्बरवार तो हैं ना। वहाँ क्या हुआ! नम्बरवार फरिश्ता स्वरूप बहुत बड़े सार्किल में राज्य दरबार के रूप में इमर्ज थे। लाइट के शेड में अन्तर था। कोई विशेष चमकता हुआ रूप था, कोई मध्यम प्रकाश रूप था, लेकिन विशेष अन्तर मस्तक के बीच चमकती हुई मणी के रूप में आत्मा का था। किसी की चमक और लाइट का विस्तार अर्थात् लाइट फैली हुई ज्यादा भी। किसी की चमकती हुई लाइट थी लेकिन फैली हुई नहीं थी। किसी की लाइट ही कम थी।
बाप-दादा ने सब बच्चों के अन्तर को चेक किया। तो देखा यन्त्र की स्पीड तेज है। पुरुषार्थी और सम्पूर्णता दोनों की समानता का अन्तर भी ज्यादा दिखाई दिया। जैसे विज्ञान के यन्त्र की स्पीड तेज है वैसे समानता के पुरूषार्थ की स्पीड उससे कम थी।
सिर्फ ग्रहण नहीं, गुण ग्रहण करो बाप-दादा की रिजल्ट के ऊपर रूह-रूहान चली कि इतना अन्तर क्यों? ब्रह्मा बाप बोले - ``मेरे सभी बच्चे नॉलेजफुल हैं।'' शिव बाप बोले - ``नॉलेजफुल के साथ त्रिकालदर्शी भी हैं। समझने और समझाने में बहुत होशियार हैं। बाप को फॉलो करने में भी होशियार है। इन्वेन्टर भी हो गये हैं, क्रियेटर भी हो गये हैं, बाकी क्या रह गया, जो अन्तर बड़ा हो गया है। इसका क्या कारण है?
'' कारण तो छोटा-सा ही है। ब्रह्मा बाप बोले - ``बच्चों की ग्रहण करने की शक्ति बहुत तेज है। इसलिए ज्ञान, गुण और शक्तियों को ग्रहण करने के साथसाथ दूसरों की कमज़ोरियों को भी ग्रहण करने की शक्ति तेज है। ग्रहण करने की शक्ति के आगे गुणग्राहक शब्द भूल जाता है। इसलिए अच्छाई के साथ कमज़ोरियाँ भी साथ में ग्रहण कर लेते हैं।'' और फिर क्या करते हैं - फिर एक खेल वहाँ इमर्ज हुआ। जो यहाँ आपकी प्रदर्शनियों में एक चित्र भी है। आपका चित्र दूसरे लक्ष्य से है लेकिन रूपरेखा वही है। वह चित्र है - शान्ति का दाता कौन? ऐसी रूप-रेखा से कुछ बच्चे इमर्ज हुए। फिर क्या हुआ?
कोई एक कमज़ोरी की बात पहले नम्बर में खड़े हुए बच्चे को सुनाई गई कि यह बात तीव्र पुरूषार्थ के हिसाब से ठीक नहीं है। तो क्या हुआ? उसने इशारा किया दूसरे की तरफ कि यह मेरी बात नहीं है लेकिन इनकी बात है। दूसरे ने कहा कि तीसरे ने भी ऐसे ही किया था तब मैंने किया। चौथे ने कहा कि यह तो महारथी भी करते हैं। पाँचवे ने कहा कि ऐसे सम्पूर्ण कौन बना है। छठे ने कहा अरे, यह तो होता ही है। सातवें ने कहा फिर तो सम्पूर्ण हो के सूक्ष्मवतन में चले जायेंगे। आठवें ने कहा बाप-दादा तो इशारा दे रहे हैं, करना तो चाहिए लेकिन संगठन है, न चाहते भी कुछ कर लेते हैं - ऐसे पुरूषार्थ की बात एक दूसरे के ऊपर देखते और रखते हुए बात ही बदल गई।
ऐसे आजकल का प्रैक्टिकल खेल बहुत चलता है। और इसी खेल में लक्ष्य और लक्षण में महान अन्तर पड़ जाता है। तो कारण क्या हुआ? इसी संस्कार के कारण सम्पूर्ण संस्कार अभी तक इमर्ज नहीं हो सकते है।तो बाप-दादा बोले इस खेल के कारण पुरुषार्थी और सम्पूर्णता का मेल नहीं हो सकता। मूल कारण ग्रहण करने की शक्ति है, लेकिन गुण ग्राहक बनने की शक्ति कम है। दूसरी बात इस खेल से भी समझ में आ गई होगी कि अपनी गलती को दूसरे पर डालना आता है, लेकिन अपनी गलती को महसूस कर स्वयं पर डालना नहीं आता। इसलिए बाप-दादा ने कहा कि नॉलेजफुल हैं, छुड़ाने में होशियार हैं, लेकिन स्वयं को, बदलने में कम।
और भी एक कारण निकला। वह क्या होगा? जिस कारण से प्रत्यक्षता होने में कुछ देरी पड़ रही है?स्वचिन्तक और शुभचिन्तक बनो वह कारण है - स्व-चिन्तन। स्व के प्रति `स्व-चिन्तक' और औरों के प्रति `शुभ-चिन्तक'। स्व-चिन्तन अर्थात् मनन शक्ति और शुभ चिन्तक अर्थात् सेवा की शक्ति। वाच् की सेवा के पहले शुभचिन्तक भावना से जब तक धरती को तैयार नहीं किया है, तब तक वाचा की सेवा का भी फल नहीं निकलता। इसलिए पहले सेवा का आधार है - शुभचिन्तक। यह भावना आत्माओं की ग्रहण शक्ति बढ़ाती है। जिज्ञासा को बढ़ाती है। इस कारण वाणी की सेवा सहज और सफल हो जाती है।
तो स्व के प्रति स्व-चिन्तन वाला सदा माया प्रूफ, किसी की भी कमज़ोरियों को ग्रहण करने से प्रूफ होगा। व्यक्ति व वैभव की आकर्षण से प्रूफ हो जाता है। इसलिए दूसरा कारण निवारण के रूप में सुनाया - `शुभ-चिन्तक और स्व-चिन्तक बनो'। दूसरे को नहीं देखो। स्वयं करो। आप सब पुरुषार्थीयों का स्लोगन है ``मुझे देखकर और करेंगे।'' `और को देखकर मैं करूँगा' यह नहीं है। तो सुना, क्या रूह-रूहान चली?
आजकल बाप-दादा कौन-सा काम कर रहे हैं? फाइनल माला बनाने के पहले मणकों के सिलेक्शन का सेक्शन बना रहे हैं। तब तो जल्दी-जल्दी पिरोते जायेंगे ना। तो हरेक अपने-आपको देखो मैं किस सेक्शन में हूँ।
नम्बरवन हैं 8 रतन और सेकेण्ड हैं 100, थर्ड हैं 16 हजार। नम्बरवन की निशानी क्या है? नम्बर वन आने का सहज साधन है - जो नम्बरवन ब्रह्मा बाप है, उसी वन को देखो। देखने में तो होशियार हो ना। अनेकों को देखने के बजाए एक को देखो। तो सहज हुआ या मुश्किल हुआ? सहज है ना। तो 8 रतनों में आ जायेंगे। सेकेण्ड और थर्ड को तो जानते ही हो।जैसे भाग्य में अपने को आगे करते हो, वैसे त्याग में `पहले मैं'। जब त्याग में हरेक ब्राह्मण आत्मा `पहले मैं' कहेगा तो भाग्य की माला सबके गले में पड़ जायेगी। आपके सम्पूर्ण स्वरूप सफलता की माला लेकर आप पुरुषार्थीयों के गले में डालने के लिए नज़दीक आ रहे हैं। अन्तर को मिटा दो।
हम सो फरिश्ता का मन्त्र पक्का कर लो तो साइन्स का यन्त्र अपना काम शुरू करे और हम सो फरिश्ते से, हम सो देवता बन नई दुनिया में अवतरित होंगे। ऐसे साकार बाप फॉलो करो। साकार को फॉलो करना तो सहज है ना। तो सम्पूर्ण फरिश्ता अर्थात् साकार बाप को फॉलो करना।आज कर्नाटक का जोन है। कर्नाटक की विशेषता बहुत अच्छी है। कर्नाटक वाले शमा पर परवाने बन जलने में होशियार हैं। वहाँ परवाने बहुत हैं। जलने में नम्बर वन हैं। जलने के बाद है चलना। तो जलने में बहुत होशियार हो। चलने में थोड़ा क्या करते हैं! चलने में चलते-चलते बाईप्लाट बहुत दिखाते हैं। भावना मूर्त नम्बरवन हैं। स्नेही और सहयोगी मूर्त्त भी हैं।
कर्नाटक निवासियों की विशेषता रचयिता बनने में होशियार है। विष्णु बनना कम आता है। शंकर रूप अर्थात् विघ्न-विनाशक - उसका भी पुरूषार्थ अभी और ज्यादा चाहिए। फिर भी बाप-दादा कर्नाटक निवासियों को मुबारक देते हैं। क्यों मुबारक देते हैं? क्योंकि प्रेम स्वरूप लगन में मगन रहने में अच्छे पुरुषार्थी हैं। अभी आगे कर्नाटक को क्या करना है, जो रह गया है? कर्नाटक की धरती फलदायक है। वी.आई.पी. के फल देने योग्य हैं। और सहज ही सम्बन्ध में आने वाले हैं। सिलवर जुबली में प्रत्यक्ष फल नहीं दिया है। वी.आई.पी. का ग्रुप कहाँ लाया है? जैसे सहज धरनी है वैसे भारत में आवाज फैलाने के निमित्त बनने वाली आत्मायें वहाँ से निकल सकती हैं।
भारत की हिस्ट्री में नामीग्रामी आत्मायें कर्नाटक में बहुत है। जिस एक द्वारा बहुतों का कल्याण सहज हो सकता है। सिलवर जुबली की सौगात क्या लाई है? कर्नाटक अभी कमाल दिखाये।ऐसे सदा स्व-चिन्तक और शुभ चिन्तक, सदा फॉलो फादर, स्व-परिवर्तन से विश्व-परिवर्तन करने वाले, ऐसे विश्व-कल्याणकारी, सर्व आत्माओं द्वारा सत्कारी, सदा त्याग में पहले मैं करने वाले, ऐसे श्रेष्ठ भाग्यशाली, मास्टर सर्वशक्तिवान आत्माओं को बाप-दादा का याद, प्यार और नमस्ते।
मुरली पढ़ने के बाद परम शिक्षक सद्गुरु शिवबाबा से बताई गई विधि मनन चिंतन है।
मनन चिंतन करने की विधि, शिवबाबा चार मुरलीयों में बतायें हैं।
01-02-1979
23-12-1987
10-01-1988
07-04-1981
मनन शक्ति ही दिव्य बुद्धि की खुरक है।
हर वाक्य का रहस्य क्या है?, हर वाक्य को किस समय में?, किस विधि के द्वारा कार्य में प्रयोग करना है?, और हर वाक्य को दूसरे आत्माओं के प्रति सेवा में किस विधि से कार्य में लाना है?, ऐसे चार प्रकार से हर वाक्य को मनन करना है।
ज्ञान के मनन चिंतन के द्वारा समर्थ संकल्प, समर्थ स्थिति और शक्तिशाली स्मृति में रह सकते हैं।
ज्ञान की स्मृति (मनन चिंतन) द्वारा हमको ज्ञान दाता शिवबाबा की स्मृति स्वतः रहती है।
मनन चिन्तन करने के लिए उपयोगी संकल्प के लिए "समर्थ संकल्पों का खजाना" उपर के शिर्षकों में देखा जा सकता है।
मनन चिंतन मुरलीयों के लिए इस लिंक को स्पर्श करें।