रिवाइज कोर्स मुरली 01-04-1992
निराकार ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप परमपिता शिवपरमात्मा इस धरती पर अवतरित होकर ज्ञान और योग से धर्म की स्थापन कर रहे हैं।
परम शिक्षक शिवपरमात्मा के द्वारा बताई गई इस ज्ञान मुरली को आत्मिक स्थिति में पढ़ना चाहिए।
आत्मिक स्थिति में आने के लिए किये जाने वाले संकल्प :
1. मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ, शिवबाबा मेरे परमपिता हैं।
2. मैं ईश्वरीय विद्यार्थि हूँ, बाबा मेरे टीचर हैं।
3. बाबा मेरे सद्गुरु हैं, मैं मास्टर सद्गुरु हूँ।
4. शिव परमात्मा मेरे जीवन साथी हैं, मैं शिव परमात्मा की जीवनसाथी हूँ।
5. सर्व संबंधों को बाबा से जोड़कर उस संबंध के कर्त्तव्य को ब्राह्मण जीवन में आचरण में लाने से आत्मिक स्थिति सहज हो जाती है।
आत्मिक स्थिति में, हर एक मुरली में, "बाबा मुरली मुझ से ही कह रहे हैं", ऐसे भाव से पढ़ना चाहिए।
उड़ती कला का अनुभव करने के लिए दो बातों को बैलेन्स - ज्ञानयुक्त भावना और स्नेह युक्त योग
अव्यक्त बापदादा अपने ज्ञानी तू आत्मा बच्चों प्रति बोले-
आज बापदादा अपने स्नेही भावना-मूर्त आत्माओं और ज्ञान-स्वरूप योगी आत्माओं को देख रहे हैं। दोनों प्रकार की आत्मायें बाप की प्रिय हैं और दोनों ही बाप से अपने अपने यथा स्नेह और भावना प्रमाण प्रत्यक्ष फल वर्से के अधिकारी हैं। ज्ञान स्वरूप योगी तू आत्मायें अपने शक्ति प्रमाण बाप के समीप समान सर्वशक्तियों की अनुभूति का वर्सा प्राप्त कर रही हैं। दोनें ही प्राप्ति स्वरूप हैं। लेकिन दोनों के प्राप्ति में अन्तर है। स्नेह और भावना-मूर्त बच्चे सदा भावना के कारण याद में रहते हैं। बाप से प्यार का अनुभव करते हैं, शक्ति का भी अनुभव भावना के फल के स्वरूप में करते हैं। लेकिन सदा और सर्वशक्तियाँ अनुभव नहीं करते।
ज्ञान स्वरूप योगी तू आत्माएं सदा सर्वशक्तियों की अनुभूति द्वारा सहज विजयी बनने का विशेष अनुभव करती हैं, समानता का अनुभव करती हैं।तो दोनों प्रकार के बच्चे वृद्धि को प्राप्त कर रहे हैं। सदा अचल अटल स्थिति का अनुभव योगी तू आत्माएं ही करती हैं। स्नेही वा भावना-स्वरूप आत्मायें भावना से, स्नेह से आगे बढ़ रहे हैं लेकिन सदा विजयी नहीं। स्नेही आत्माओं के मन में, मुख में सदा बाबा-बाबा है इस कारण समय प्रति समय सहयोग प्राप्त होता रहता है। भावना का फल समय प्रमाण बाप द्वारा प्राप्त हो ही जाता है। लेकिन समान बनने में ज्ञानी योगी तू आत्मायें समीप हैं। इसलिए भावना और ज्ञान स्वरूप बनने का लक्ष्य रखो।
जितनी भावना हो उतना ही ज्ञान स्वरूप भी हो। सिर्फ भावना वा सिर्फ ज्ञान यह भी सम्पूर्णता नहीं। ज्ञान-युक्त भावना, स्नेह-सम्पन्न योगी आत्मा - यह दोनों का बैलेन्स सहज उड़ती कला का अनुभव कराता है। बाप समान अर्थात् दोनों की समानता।
वर्तमान समय भावना स्वरूप आत्मायें सेवा में ज्यादा आती हैं। यह आत्मायें भी स्थापना के कार्य में, चाहे आदि सनातन देगता धर्म की स्थापना में, चाहे राज्य के स्थापना में, दोनों में आवश्यक है। लेकिन अभी समय प्रमाण ज्ञानी योगी तू आत्माओं की आवश्यकता और ज्यादा है। क्योंकि आगे के समय में वैराग्य वृत्ति के वायुमण्डल के कारण भावना स्वरूप आत्मायें और भी सहज आनी ही हैं।
इसलिए सेवा के लक्ष्य में ज्ञानी-योगी तू आत्माओं के तरफ अटेन्शन ज्यादा चाहिए। ऐसी आत्माओं की वृद्धि आवश्यक है। समझा, ऐसे नहीं समझो कि संख्या बहुत बढ़ रही है। लेकिन ऐसी बाप समान सर्वशक्तियों की अनुभूति वाली आत्माएं तैयार करो। राजधानी की वृद्धि तो अच्छी हो रही है। लेकिन विश्व परिवर्तन में दोनों स्वरूप के बैलेन्स वाली आत्माएं ही निमित्त बनती हैं। क्योंकि विश्व परिवर्तन के लिए बहुत सूक्ष्म शक्तिशाली स्थिति वाली आत्माएं चाहिएं। जो अपनी वृत्ति द्वारा, श्रेष्ठ संकल्प द्वारा अनेक आत्माओं को परिवर्तन कर सके। स्वयं स्नेही वा भावुक आत्मा स्वयं में बहुत अच्छे चलते हैं लेकिन वह स्नेह व भावना विश्व के प्रति नहीं होती।
स्वयं के व्रति वा कुछ समीप आत्माओं के प्रति होती है। बेहद की सेवा वा विश्व प्रति सेवा बैलेन्स वाली आत्माएं कर सकती हैं। बेहद की सेवा वा अपनी शक्तिशाली मन्सा शक्ति द्वारा, शुभ भावना और शुभ कामना द्वारा होती है। सिर्फ स्वयं के प्रति भावुक नहीं लेकिन औरों को भी शुभ भावना और शुभ कामना द्वारा परिवर्तित कर सकते हो। तो ऐसे भावना और ज्ञान, स्नेह और योग शक्ति हो, ऐसी आत्माएं बने हो कि सिर्फ स्नेही भावुक आत्माओं को देख खुश हो रहे हो? कल्याणकारी बने हो? या बेहद विश्व कल्याणकारी बने हो - यह चेक करो। क्या रिज़ल्ट है? बापदादा ने सुनाया कि बाप को दोनों ही प्यारे हैं। दोनों प्रकार की आत्माओं को देख बापदादा खुश होते हैं।
फिर भी स्नेही आत्माएं बन बाप को अपना तो बना लिया ना? पहचान लिया, वर्से के अधिकारी बन गये, कोटों में कोई की लाइन में आ गये, अपने ठिकाने पर पहुँच गये, तन के भटकने, मन के भटकने से बच गये, इसलिए खुश होते हैं ना। बच्चे भी खुश,बाप भी खुश हैं। ख़ुशकिस्मतवाले तो बन गये हैं ना? दुनिया के हिसाब से डायरेक्ट बाप के बनने वाले देखो कितनी साधारण आत्माएं हैं! विश्व के शिक्षक के स्टूडेन्ट देखो कैसे वन्डरफुल हैं! पढ़ाने वाला ऊंचे ते ऊंचा और पढ़ने वाले साधारण। लेकिन साधारण ही साधारण स्वरूप में आनेवाले बाप को जानते हैं। बापदादा भी वी.आई.पी. बनके तो नहीं आते हैं ना, साधारण रूप में आते हैं।
कोई प्राइम मिनिस्टर वा किसी राजा के तन में नहीं आते। इसलिए पहचानने वाले साधारण ही भाग्य प्राप्त करते हैं। खुशनसीब हो ना, कितना भाग्य मिला हैं पद्मापद्म कहना भी कुछ नहीं है।अभी भी देखो संख्या तो बहुत है ना। पहले सोचते थे यह इतना बड़ा हाल किस काम में आयेगा और अभी क्या लगता है इससे बड़ा हाल होना चाहिए ना। ब्राह्मणों को यह वरदान है, तितना बड़ा बनाते जायेंगे उतना छोटा होता जायेगा। जो भी आये हैं सभी आने वालों को मुबारक देते हैं, लेकिन सिर्फ भावुक नहीं बनो, ज्ञानी भी बनो। प्रकृति के भी ज्ञानी बनो। ज्ञान सिर्फ आत्मा का नहीं। आत्मा, परम आत्मा और प्रकृति। उसमें ड्रामा भी आ जाता है। तीनों का ज्ञान चाहिए।
कहाँ जा रहे हैं और अपने लिए क्या अटेन्शन चाहिए, यह प्रकृति का भी अगर नॉलेज नहीं है तो नॉलेजफुल नहीं है। स्थान का, व्यक्ति का, स्थिति तीनों का ज्ञान रखो। सिर्फ भावुक नहीं बनो, जाना ही है, लाना ही है। ज्ञान स्वरूप माना दूरादेशी, त्रिकालदर्शी, तीनों का ज्ञान अगर स्पष्ट है तो सफलता मिलती है। अगर कोई अपनी गलती से बार-बार बीमार होता है तो बापदादा उसको ज्ञान योगी नहीं कहते। ज्ञान का अर्थ है समझ। अपनी स्थिति को भी समझो, अपने शरीर को भी समझो। आत्मा की स्थिति, शरीर की सथिति, वायुमण्डल का सब ज्ञान बुद्धि में है तो नॉलेजफुल हैं। इसीलिए सिर्फ भावना पर राज़ी नहीं हो जाओ।
आने वाले, लाने वाले, दोनों को नॉलेजफुल होना चाहिए। जो होता है वह तो मीठा ड्रामा ही कहेंगे। हलचल में तो नहीं आयेंगे ना - अचल। लेकिन आगे के लिए अटेन्शन। बापदादा भी जानते हैं कि बच्चे कितनी मेहनत सहन करके पहुँचते हैं। इसके लिए तो मुबारक दे ही दी। जिस आत्मा को जो वर्सा है वह उसको प्राप्त होना ही है। वर्से से वंचित कोई नहीं रह सकता। चाहे साकार में सम्मुख हैं, चाहे अपने स्थान पर मनमनाभव रहते, वर्सा अवश्य प्राप्त होना है। डबल नॉलेजफुल होना है, हाफ नालेजफुल नहीं बनो।
अच्छा, चारों ओर के सर्व खुशनसीब आत्माएं, सर्व स्नेह और योग शक्ति की समानता की अनुभवी आत्माएं, भावना और ज्ञान स्वरूप आत्माएं, सदा बाप समान बनने के लक्ष्य को पूर्ण करने वाली आत्माएं, सदा समीप अनुभव करने वाली आत्माएं, ऐसे सदा अचल-अडोल रहने वाली विशेष आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।(नोट:- आज मधुबन में आई हुई पार्टा में एक ही घण्टे के अन्दर कर्नाटक ज़ोन के दो बुजुर्ग भाइयों ने अपना पुराना शरीर छोड़ा है इसलिए बापदादा ने सभी का विशेष अटेन्शन खिंचवाया है।)
दादियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात संगठन की शक्ति को आगे बढ़ा रही है। अच्छी हिम्मत से एक दो को सहयोग दे वृद्धि को प्राप्त कर रहे हो। आप निमित्त बनी हुई आत्माओं की हिम्मत अनेक आत्माओं की हिम्मत को बढ़ाती है। हर परिस्थिति के अनुभवी बन गये। नथिंग न्यु लगता है ना, बापदादा पर्दे के अन्दर सकाश दे रहे हैं, लेकिन पार्ट बजाने वाली स्टेज पर आप आत्मायें हो। अच्छा पार्ट बजा रही हो। बापदादा सदा महावीरों के निमित्त संगठन को विशेष अमृतवेले नम्बरवन उन्हीं आत्माओं को यादप्यार गुड मार्निंग करते हैं और वही सकाश कहो, प्यार कहो, सारे दिन की खुराक हो जाती है। ऐसे लगता है ना? सब ठीक है।हिम्मत से सफलता है ही।
मुरली पढ़ने के बाद परम शिक्षक सद्गुरु शिवबाबा से बताई गई विधि मनन चिंतन है।
मनन चिंतन करने की विधि, शिवबाबा चार मुरलीयों में बतायें हैं।
01-02-1979
23-12-1987
10-01-1988
07-04-1981
मनन शक्ति ही दिव्य बुद्धि की खुरक है।
हर वाक्य का रहस्य क्या है?, हर वाक्य को किस समय में?, किस विधि के द्वारा कार्य में प्रयोग करना है?, और हर वाक्य को दूसरे आत्माओं के प्रति सेवा में किस विधि से कार्य में लाना है?, ऐसे चार प्रकार से हर वाक्य को मनन करना है।
ज्ञान के मनन चिंतन के द्वारा समर्थ संकल्प, समर्थ स्थिति और शक्तिशाली स्मृति में रह सकते हैं।
ज्ञान की स्मृति (मनन चिंतन) द्वारा हमको ज्ञान दाता शिवबाबा की स्मृति स्वतः रहती है।
मनन चिन्तन करने के लिए उपयोगी संकल्प के लिए "समर्थ संकल्पों का खजाना" उपर के शिर्षकों में देखा जा सकता है।
मनन चिंतन मुरलीयों के लिए इस लिंक को स्पर्श करें।